मेला दिलों का आता है…..

“चुन्नीगंज दशहरा मेला में आपका स्वागत है। कृपया चलते-फिरते नज़र आएँ, एक जगह भीड़ न बढ़ाएं। वैसे तो चुन्नीगंज में कोई चोर-उचक्के नहीं हैं, मगर इस बार मेले की रौनक को देखते हुए आस पड़ोस के कस्बों के चोर-उचक्के मेले में विघ्न डालने जरूर आ सकते हैं। इसीलिए माता-बहनों से अनुरोध है कि वो अपने पर्स और सोने की चेन का खास कर के ध्यान रखें।  नौजवानों से अनुरोध है कि वो मौज करें, खर्च करें, दान करें, और महिलाओं का सम्मान करें। जो भी छेड़खानी करता हुआ दिखेगा उसको अघा के पेला जायेगा। चुन्नीगंज दशहरा मेला में आपका स्वागत है”, टिंचू माइक वाला, जिसने पूरे क़स्बे में घूम-घूम कर घोषणा करने का जिम्मा लिया था, अब वो जिम्मेदारी दशहरा मेला के मैदान में शिद्दत से निभा रहा था।

 चुन्नीगंज वालों के लिए भी ये दशहरा अभूतपूर्व था क्यों कि चुनाव के अलावा ऐसे ‘अनाउंसमेंट और होर्डिंग’ पूरे क़स्बे में कभी देखने को नहीं मिलते थे। बब्बन एंड कंपनी की मेहनत ने पूरा समा बांध रखा था। कुछ भी कहा जाये लेकिन इस बार चुन्नीगंज के मेले के चर्चे पूरे जिले में थे।

इधर पथरचट्टी रामलीला कमेटी का पूरा मैदान खचा खच भरा हुआ था। चाट, पानी के बताशे, बुढ़िया के बाल, छोले-कुलचे, और पता नहीं क्या-क्या, पूरे क़स्बे की हर मशहूर दुकान ने मैदान का हर कोना पकड़ रखा था। मेला लगभग-लगभग अपने पूरे शबाब पर था।

बताते चलें कि आज नवमी का दिन था और रामलीला के अंतिम पड़ाव से बस एक दिन दूर। सबसे आगे ठाकुर साहब और ठकुराइन बैठी थीं, और वही साड़ी पहन कर आयीं थी जिसका ज़िक्र शेरू ने चंदा लूटते (मांगते) वक़्त किया था।

“अरे ठाकुर साहब, आपके जलवे ने एक बार फिर से अपने क़स्बे की इज़्ज़त बचा ली है। दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान ऐसा कोई भी अखबार नहीं जिसमे चुन्नीगंज रामलीला कमेटी की चर्चा न हो”,  ठाकुर साहब से संपर्क बढ़ाने के उद्देश्य से उनके पीछे बैठे एक अधेड़ व्यक्ति ने माहौल बनाया।

बगल में बैठा बब्बन मन ही मन पीछे वाले को गरिया रहा था, “हाँ सब कुछ तो ठाकुर साहब ने ही किया है न। ये ताम-झाम तो रातो रात प्रकट हो गए है। हम लोग तो किराये पर आये हैं”

तभी मंच से कादरी भाई की आवाज़ आयी –

“आ चुके हैं हम इस चमन में, आप क्यों खोए हैं जनाब इस अंजुमन में। तो जागिये, देखिये ये महफ़िल-ए-शाम क्या रंग लायी है। तो मेहरबान, कदरदान, नौजवान, थूकदान, पीकदान, आप सभी को चुन्नीगंज दशहरा कमेटी की ओर से प्रणाम, नमस्कार, आदाब, सत श्री अकाल और ‘गुड इवनिंग’”।

कादरी भाई पूरे साल इसी बात का इंतज़ार करते थे कि जल्दी से रामलीला आये और उनको मंच संचालन का मौका मिले। और ‘एंकरिंग’ भी ऐसी कि एकदम फ़िल्मी। वो भूल जाते थे कि कार्यक्रम का उद्देश्य क्या है। बस हर बार एक ही पंक्ति के साथ वो शुरुआत करते थे। बता दें कि उनमे हीरो बनने का इतना जूनून था कि जवानी में दो बार बम्बई भागने की कोशिश की थी। लेकिन टिकट बाबू की मुखबिरी के चलते हर बार टिकट खरीदते ही पकड़ लिए जाते थे। तबसे आज तक उनका और टिकट बाबू, जो उनके सगे मौसिया थे, के बीच मरे-मराये भी आना-जाना बंद था।

खैर, अपनी घिसी पिटी पंक्ति के बाद कादरी भाई ने ठाकुर साहब को मंच पर दो शब्द बोलने के लिए आमंत्रित किया। 

जैसे ही ठाकुर साहब मंच पर चढ़े, पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। उस समय ठाकुर साहब को लगा सवा लाख रूपये का चंदा व्यर्थ नहीं गया। इधर बब्बन को कहीं न कहीं मन में ये ज़रूर लग रहा था कि दिन रात घिसवाया उसने और उसके दोस्तों ने और ताली लूट के ले जा रहे हैं ये ठाकुर साहब। आखिर ये दुनिया भी पैसे के पीछे ही भागती है, मेहनत की कोई कदर ही नहीं।

इसी बीच ठाकुर साहब ने बोलना शुरू किया, “भाइयों, बहनो और माताओं। आप सबको इस महान पर्व की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी हमारे क़स्बे का दशहरा पूरे जिले में नंबर एक होगा। जैसे आप लोग आज आए हैं वैसे ही कल भी पधार कर मेले को और भव्य बनाएं। आप लोगों के उत्साह और भागीदारी को देखते हुए और मातारानी के आशीर्वाद से मैं आप लोगों के लिए छोटे से भंडारे का आयोजन करने वाला हूँ। आप सभी अपने परिवार के साथ इस भंडारे की खिचड़ी और अन्य प्रसाद का आनंद उठाएं और अपना प्यार और स्नेह हम सब पर बनाए रखें”, एक बार फिर पूरा मैदान तालियों से गूंजने लगा।

 इस भंडारे की आकस्मिक घोषणा ने बब्बन मित्र मंडली को चकित कर दिया। वो लोग उत्साहित भी लगे और थोड़े चिंतित भी। चिंता इस बात की थी कि इतने कम  समय में इतना बड़ा कार्य कैसे किया जायेगा। आखिर पूरे क़स्बे के लिए खिचड़ी बनाना कोई छोटा-मोटा काम नहीं था। मगर ठाकुर साहब ने आँखों ही आखों में बब्बन को निश्चिन्त होने का इशारा किया और शेरू को इशारा कर दिया किया कि सब संभाल ले। शेरू ने भी बब्बन को इशारों में समझा दिया कि सब हो जायेगा वो दशहरे पर ध्यान दे। क्योंकि इसमें ठाकुर साहब और शेरू शामिल थे, बब्बन ने भी मान लिया कि शायद सब ठीक से हो जायेगा।

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“आप लोग अपनी तालियाँ आपके अपने नवयुवकों के लिए बचा कर रखिये जो इस भव्य आयोजन के असली नायक हैं। मैं आज इस मंच से उनको धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने ये सब कमाल किया है। पहले ऐसा लग रहा था कि पचास सालों में पहली बार हम अगल-बगल के कस्बों से, जो कि इस बार बहुत मेहनत कर रहे थे, हार जाएंगे।  लेकिन बब्बन जी और उनके मित्र मंडल ने कमाल कर दिया और हमें गलत साबित किया। उन्होंने ये साबित कर दिया कि चुन्नीगंज के युवकों को थोड़ा मार्गदर्शन मिले और थोड़ा आर्थिक सहायता मिले तो वो साधारण नहीं बल्कि असाधारण काम कर सकते हैं। तो मैं आप सब से आग्रह करता हूँ कि बब्बन जी और उनके तमाम मित्र मंडल का जोरदार तालियों से स्वागत करें”, इस बात से ठाकुर साहब ने बब्बन मंडली का सम्मान बढ़ाने के साथ-साथ अपने योगदान का भी जिक्र कर दिया और बब्बन मित्र मंडली को मंच पर आने का इशारा किया।

शायद एक खुद्दार इंसान को सम्मान के अलावा ज्यादा कुछ नहीं चाहिए होता है, इसीलिए इतना सुनकर बब्बन की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। बब्बन गर्व से भरा हुआ था और उसके हर एक बढ़ते कदम पर मैदान से आते बब्बन – बब्बन का नारा और तेज़ होता जा रहा था। वहीं बैठा पाठक परिवार भी पहली बार गर्व से आस-पास के लोगों को बता रहा था कि ये बब्बन पाठक परिवार का चिराग है। भले कौशल्या मन ही मन सोच रही थी कि नेतागिरी में बब्बन पहले से ही आगे है, कौन सा कलेक्टर बन गया है जो सब इतनी वाह-वाही कर रहे हैं। लेकिन अन्दर की भावनाओं को चेहरे पर नहीं लाते हुए, कौशल्या भी ताली बजा रही थी।

बब्बन को एक ‘मोमेंटो’ और शाल पहना कर सम्मानित किया गया। बब्बन को सम्मानित किया तहसीलदार साहब ने और शेरू का सम्मान SSP साहब ने किया। लेकिन अन्नू को ठाकुर साहब की आँखे ढूंढ रही थी, अन्नू एक कोने में छुपने की कोशिश कर रहा था। तभी ठाकुर साहब की शिकारी नज़रों ने अन्नू  को खोज लिया, “अरे बच्चे वहाँ क्या कर रहे हो? आओ मंच के ऊपर”, ठाकुर साहब ने अन्नू को बुलाया।

“अबे आओ बे”, शेरू ने लपक कर अन्नू को मंच के ऊपर खींच लिया।

“भाइयों और बहनो, कल जो विशालकाय रावण कुछ बेहद रोमांचकारी करतब करेगा, उसमे पूरा दिमाग इसी बच्चे का लगा है। ठाकुर साहब ने पीठ पर हाथ रखते हुए अन्नू की कलाकारी पूरे क़स्बे के सामने प्रस्तुत की। एक बार फिर ताली बजने ही वाली थी की ठाकुर साहब  ने दोबारा से बोलना चालू किया, “क्योंकि इस बच्चे ने इतना अच्छा काम किया है तो हमने भी सोचा की क्यों न उसका सम्मान एक ख़ास व्यक्ति से कराया जाये। आईये पंडित जी”, ठाकुर साहब ने इतना कहते हुए मंच के पीछे से उस ख़ास व्यक्ति का आवाहन किया।

उस ख़ास व्यक्ति को देख कर अन्नू का खून जैसे जम गया था, हालत ऐसी की काटो तो खून नहीं। अन्नू के चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ने का सबसे बड़ा कारण था कि वो व्यक्ति उनके जनक अर्थात राज कुमार मिश्रा जी थे। मिश्रा जी एक बेहद सम्मानित व्यक्ति थे, लेकिन अन्नू का पेट इसलिए पानी-पानी हो रहा था क्यों कि अन्नू ने अपने पिताजी को ये बोलकर मोहलत ले रखी थी कि आज कल कॉलेज वाले एक ‘प्रोजेक्ट’ करवा रहे हैं तो रात-रात भर बाहर रहना हो सकता है। अन्नू को बिलकुल यकीन नहीं था कि उसका झूठ इस तरह भरे समाज के सामने पकड़ा जायेगा।

“आओ बेटा अपने पापा से सम्मान ग्रहण करो। आज महाराज दशरथ के हाथों राम को आशीर्वाद मिलते पूरा चुन्नीगंज देखेगा”, कादरी भाई ने बड़े प्यार से कहा, मगर अन्नू के कानों को ये सुनाई दी, “आज हिरणकश्यप के हाथों प्रल्हाद की कुटाई सारा चुन्नीगंज देखेगा”

मिश्रा जी ने ‘मोमेंटो’ देने के बाद शाल ओढाने के साथ-साथ अन्नू के कंधे में एक ज़बरदस्त चिकोटी काटते हुए धीरे से आने वाली सुनामी का संकेत आंखों ही आँखों में दे दिया था। अन्नू की हालत मानो ऐसी थी कि जैसे अभी धरती फटे और माता सीता की तरह वो उसी में समा जाये। खैर, अभी रावण ही नहीं मारा था तो धरती कहाँ ही फटने वाली थी।  मिश्रा जी सम्मान करने के बाद पहली पंक्ति में लगे सोफे में जा कर बैठ गए।

इसके बाद कमेटी के मुख्य कार्यकर्ताओं को एक-एक कर के ठाकुर साहब ने खुद अपने हाथों से सम्मानित किया। यहाँ ये जानना जरूरी है कि युवाओं को सब के सामने सम्मानित करने की योजना ठाकुर साहब की ही थी। उन्होंने अपने चेले चपाटों से कह के शाल और ‘मोमेंटो’ का इंतज़ाम करवाया था। मगर उनकी इस चाल ने ना कि सिर्फ कार्यकर्ताओं में एक जोश भरा बल्कि चुन्नीगंज के सभी युवाओं के दिलों में अपना स्थान बना लिया। इस प्रोग्राम के समापन के बाद ठाकुर साहब ठकुराइन के बगल में जाकर जैसे ही बैठे वैसे ही ठकुराइन ने हमला बोल दिया, “दुनिया भर की तारीफ करना लेकिन मेरे बबलू के बारे में एक शब्द नहीं बोल पाए तुम? क्यों, आखिर क्यों इतना चिढ़ते हो उससे? बताओ हमको?”

“गज़ब करती हो तुम भी। हर जगह बबलू को पेला न करो। उसने पूरे आयोजन में घुइयां तक नहीं छीली तो उसका नाम क्यों लेते। अभी जब तुम्हारे प्रिय भाई की आरती करने जाएंगे तब बोल देंगे। और हाँ सुनो मेरी वजह से ही तुम्हारा भाई आज राम बना है, नहीं तो कोई उसको कोई जामवंत भी न बनाये”, ठाकुर साहब ने इस हमले का मुँह तोड़ जवाब दिया।

“अच्छा जाओ-जाओ अपना काम करो। हमारी जिद्द के चक्कर में बाबू जी ने उसको बम्बई नहीं भेजा, नहीं तो आज मेरा भाई बबलू, सुनील शेट्टी को टक्कर दे रहा होता”, ठकुराइन बड़बड़ाती रही और ठाकुर साहब ने नज़रअंदाज़ करना उचित समझा।

इस तरह सम्मान समारोह ख़त्म हो चुका था और अब बारी थी राम दरबार के पूजन की। राम दरबार के पूजन में अभी थोड़ा वक्त था तो समारोह में थोड़ा सा विराम लिया गया।

चूँकि पूरे साल में कादरी भाई को दिल खोल कर बोलने का मौका सिर्फ राम लीला और दशहरा में ही मिलता था तो उन्होंने दिल पर पत्थर रख कर ‘इंटरवल’ की घोषणा कर दी। उसके बाद टिंचू की आवाज़ फिर से पूरे मैदान में गूंजने लगी – “कृपया चलते-फिरते नज़र आएं, पश्चिम द्वार के सामने जिसने भी लाल रंग की मारुती लगाई है उसे वहाँ से जल्दी हटा दें नहीं तो उसके पहिये निकाल लिए जायेंगे। सब लोग जेब कतरों से सावधान रहें …………..”

“अरे ठाकुर साहब, जितना आपका नाम बड़ा है उतना ही बड़ा आपका दिल। इतना बड़ा भंडारा आज तक किसी ने नहीं किया होगा। हम लोग आपको मायूस नहीं करेंगे”, बब्बन ने मंच के बगल में खाली जगह पर ठाकुर साहब को रोकते हुए कहा।

“अरे नहीं बेटा। मुझे तुम्हारी  मेहनत और योग्यता पर पूरा भरोसा है। तुम लोगों के भरोसे ही तो इतना बड़ा वादा कर दिया। तुम्हारे नेतृत्व में तुम और तुम्हारे मित्र लोग पिछले 30-40 दिन से दिन-रात एक कर दिए हो। पूरा क़स्बा देख रहा है तुम्हारी मेहनत को, हम तुमसे बहुत प्रभावित हैं। और कुछ सोंचे हैं तुम्हारे बारे में, इन सब से फुर्सत हो जाओ तो आना शेरू के साथ घर पर, साथ में खाना खाएंगे और कुछ धंधे पानी की बात करेंगे।

“शेरू तुम बब्बन को ले के आओ अगले हफ्ते में और हाँ मेला में कुछ कम ज्यादा हो तो सोचना मत बेझिझक ले लेना हमसे”, ठाकुर साहब बब्बन के काँधे पर हाथ रखते हुए बोले।

“ठाकुर साहब हमको हमारे बाबू जी ने खुद्दारी से जीवन जीना सिखाया है और जहाँ भी सम्मान मिलेगा हम वहाँ साथ देने के लिए तैयार हैं”, बब्बन अपनी बात बोल पाता कि बीच में एक शिकायत भरी आवाज़ गूंजी।

“अरे ठाकुर साहब अंकल जी, आपने तो अपने सवा लाख के चंदे जो बदला निकाला है कि क्या हीं बताएँ? हमको स्टेज पर बुला लिया और तो और हमारे पापा को भी बुला लिया”, अन्नू ने कहा।

“अरे बेटा हमको लगा कि तुम्हे अपने पापा से सम्मान पाकर गर्व होगा तो शेरू से बुलवा लिए मिश्रा जी को”, ठाकुर साहब ने अन्नू को समझाया।

“अरे अंकल जी, यहाँ तो सम्मान मिल गया, अब घर पर कितना अपमान मिलेगा वो तो हम ही जानते हैं। पिछली बार झूठ बोलने पर हमको कान से पकड़ कर अपने बराबर उठा लिया थे और दो सेकेंड तक हवा में रखने के बाद छोड़ दिया पापा ने ऐसे ही। जो धड़ाम से आँगन में गिरे थे कि आज भी सोच कर कमर में दर्द होता है और अचानक कान में सू सू की आवाज़ आने लगती है। आपके इस सम्मान के चक्कर में लगता है कि इस बार अपंगता मिलने वाली है”, अन्नू ने भयभीत स्वर में कहा।

ये सुन कर ठाकुर साहब हंस पड़े और बोले, “अरे नहीं बेटा, तुम ज्यादा मत सोचो, हमको मिले थे अभी और धन्यवाद बोले हमको बुलाने के लिए”

“अरे नहीं अंकल जी, हमारे पापा इस मैटर में खिलाड़ी आदमी है, किसी को भी पता नहीं चलने देते हैं कि वो गुस्सा हैं, चलिए देखते हैं रात को क्या होता है?” अन्नू ने बात ख़त्म की।

“अरे कुछ नहीं होगा। अरे अभी राम दरबार पूजन में कितना टाइम है भाई?”, ठाकुर साहब ने शेरू की तरफ देखते हुए पूछा।

“बस 15 मिनट, बबलू भैया को तैयार किया जा रहा है”, शेरू ने बताया।

“कर लो तैयार, रावण जैसे मुँह वाले को राम बनाओगे तो रंगना पोतना तो पड़ेगा ही”, ठाकुर साहब ये वाकया भुनभुनाते हुए आगे निकल गए और ये भी देख लिया कि कहीं आस पास ठकुराइन तो नहीं  हैं। यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि बबलू एकदम ठकुराइन पर गया था।

**

उधर मंच के पीछे अलग ही रायता फैला हुआ था। बबलू को बताई गई अदाकारा, जो सीता बनने वाली थी, मलेरिआ के चक्कर में आज नहीं आ रही थी और कमेटी के कहने पर ऋतु नाम की लड़की सीता बनने के लिए तैयार हुई थी।

“इस बार पूरे क़स्बे में एक भी मच्छर नहीं छोड़ेंगे हम, तड़पा-तड़पा कर मारेंगे। साला ‘एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बनाने’ के किस्से सब ने सुने हैं, इस बार साले सब मच्छरों को हिजड़ा हम बनाएंगे”, बबलू गुस्से में लाल चेहरा लिए सीता जी की बीमारी के कारण को ही जड़ से उखाड़ फेंकने की सौगंध खाता जा रहा था।

“भैया आ तो गई हैं सीता जी, और ज्यादा गुस्साओ न, गुस्सा से पसीना आ रहा है और ऐसे ही होता रहा तो पूरा ‘मेकअप’ बह जायेगा स्टेज पर ही, फिर हमसे न बोलना कोई”, मिट्ठू मेकअप वाले ने चेतावनी भरे स्वर में सबको चेताया।

इसके आगे की बात कर के मिट्ठू ने अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी गलती कर दी, “और हाँ भैया ये वाले राम जी वैसे भी ज्यादा काले हैं तो ज्यादा ही ‘फाउंडेशन’ लगेगा, पैसा भी ज्यादा पड़ेगा”

“ऐ मेकअप, एक तमाचा मारेंगे तो गाल काला पड़ जायेगा फिर ज़िन्दगी भर ‘फाउंडेशन’ लगा कर छुपाते रहना। काला किसको बोल रहे हो काले कुत्ते जैसे मुंह वाले? बचपन में हमारा भाई दूध जैसा गोरा था, वो तो एक बुखार के बाद वो मुंहझौसा कम्पाउण्डर की दवाई ‘रिएक्शन’  कर गई नहीं तो ऋषि कपूर से कम गोरा नहीं होता। और हाँ काला कहाँ है, थोड़ा सांवला है। दोबारा अपने मनहूस मुँह से हमारे भाई के रंग के  बारे में कुछ बोले तो इस पूरे जिले में दाना-पानी बंद करवा दूंगी”, ठाकुराइन के धमाकेदार आगमन और गर्जन से पूरा ‘मेकअप रूम’ ठहर सा गया और मिट्ठू की पतलून गीली होते-होते रह गई।

“जिज्जी आ गई हमारी”, बबलू की जैसे जान में जान आई। “जिज्जी देखो ये मिट्ठू हमको बोल रहा है कि लाल वाली लिपस्टिक लगाओ, हम लड़की हैं क्या जो लिपस्टिक लगायेंगे”, बबलू ने जिज्जी से शिकायत की।

“अरे तोता जैसा नाक वाले मिठुआ, तुम तोता हो तो सबका होंठ लाल होगा क्या? ये सब क्या है? मेरा बबलू लिपस्टिक नहीं लगाएगा, बस”, ठकुराइन ने अपना फरमान सुनाया।

“अरे ठकुराइन भाभी, आप बाहर जाओ। बबलू भैया को हम पूरा चौकस राम जी बना कर लाएंगे”, ठीक समय पर शेरू ने आ कर ठकुराइन को प्यार से बाहर जाने को कहा।

“शेरू देख लेना, पूरे सवा लाख हमने बबलू के लिए ही चंदे में दिलवाये थे।  उंच-नीच हुआ तो घर में घुसना बंद कर देंगे तुम्हारे ठाकुर साहब और तुम्हारा, दोनों का”, ठकुराइन ने चेतवानी देते हुए कहा और साथ में मिट्ठू को भी तीखी नज़र से देख कर अपनी औकात का प्रमाण दे दिया।

“अरे ठीक है, आप बाहर जाओ और सब हमारे ऊपर छोड़ दो”, शेरू ने तम्बू का पर्दा हटाते हुए ठकुराइन के लिए रास्ता बनाया।

उधर ठकुराइन तम्बू से बाहर निकली, इधर ऋतु साक्षात् माँ सीता के अवतार में अंदर आयी। लाल पार की सफ़ेद साड़ी में लिपटी ऋतु किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। बड़ी-बड़ी आँखें जो मोटे-मोटे काजल के कारण और भी ख़ूबसूरत लग रही थी, माथे में चन्दन का  तिलक, सिर पर तिरछा ज़ूडा जो खुशबूदार मोगरे के फूल से सुसज्जित था। उसी समय बबलू की नज़र ऋतु की छोटी सी मुस्कान पर गई, जो चटक लाल लिपस्टिक से किसी गुलाब की पंखुड़ी से कम नहीं लग रही थी। बबलू वहीं पहली नज़र के प्यार का शिकार हो गया।

“शेरू भैया, जल्दी बताइये राम जी को लिपिस्टिक लगाना है कि नहीं। ऐसे भी यहाँ तम्बू में नासपीटे मच्छरों ने काट रखा है, जल्दी से काम निपटा कर जाना है चाट खाने?”, मिट्ठू ने झुंझलाते हुए शेरू से पूछा।

“क्यों नहीं लगेगी लिपिस्टिक, सीता माता ने लगाई है तो राम जी भी लगाएंगे। आखिर दोनों के 36 में 36 गुण मिले थे। एक भी कम पड़ा तो जिज्जी से बोल कर तुम्हारी बत्तीसी को बाहर निकलवा देंगे। और साले, मच्छरों को नासपीटा कहने वाला तुम कौन हो बे। तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। तुम साले अपना पेट भरने के लिए मेकअप के नाम पर दूसरों का पैसा चूसते हो, बेचारे मच्छर भी खून चुसते हैं। तो क्या गलत है इसमें?”,  बबलू के इस नए रूप को सब वहाँ आश्चर्य से देख रहे थे।

“भैया अभी तो आप ही मच्छरों को हिजड़ा बनाने की बात………”, मिट्ठू इसके आगे कुछ बोलता उससे पहले बबलू ने उसे टोकते हुए कहा, “बंद करो अपनी बकवास, देखो ऋतु जी आयी हैं, बैठने के लिए कोई कुर्सी लाओ”

“अबे यार मिट्ठू जल्दी करो यार, कितना टाइम लगाओगे”, शेरू ने बबलू के अंदर उबलते नए-नए इश्क़ को नज़रअंदाज़ करते हुए मिट्ठू को काम जल्दी निपटाने का आदेश दे दिया।

उधर कादरी भाई की घड़ी में भी 30 मिनट का अल्प-विराम हो चुका था और जब तक राम दरबार लगता तब तक वो जितने भी ‘स्पॉन्सर’ थे उनकी खूबियां पूरे श्रोता लोगों को बताने में लगे थे।

इधर सिगरेट से काले पड़े होठों को चटक लाल लिपस्टिक से पोतने के बाद, बबलू पूरा तैयार हो चुका था। भगवान् राम से मन ही मन अपनी भूल-चूक की क्षमा मांगते हुए, आज के रंगमंच के श्री राम जी को सबसे पहले प्रणाम मिट्ठू ने किया और ज़ोर से “जय श्री राम” की उद्घोषणा की। फिर वहाँ मौजूद सब ने राम लीला के भगवान् राम और सीता जी को सिर झुका कर प्रणाम किया। मिट्ठू की ज़ोरदार “जय श्री राम” की  उद्घोषणा सुन कर, ठकुराइन, जो बाहर ही खड़ीं थीं, वो दौड़ कर अंदर आ गयीं और आते ही उनकी आँखें  ख़ुशी से चमक उठी और उस समय बबलू को भूल उन्होंने राम और सीता को सादर प्रणाम किया और अगवानी करते हुए स्टेज तक ले गई।

सृष्टि के कण कण में भगवान् को मानने वाले हम सनातन धर्मी, राम लीला के दिन मंच पर जो भी हो, जैसा भी हो, उसमे अपना भगवान् राम और सीता माता देख ही लेते हैं। राम और सीता जी को आते देख पूरा मैदान अपनी-अपनी जगह खड़ा हो गया और “जय श्री राम”, “सीता राम”, “सिया वर रामचंद्र की जय”,  का जयघोष मानो पूरे क़स्बे में गूँज रहा था।

सभी ने अपने-अपने हाथ जोड़ रखे थे, और घर से फूल, प्रसाद जो भी लाये थे वो चढ़ाने के लिए आगे बढ़ने लगे। कादरी भाई भी ‘बोलो राजा राम चंद्र की जय’ वाले उद्घोष से पूरे माहौल को भक्तिमय बनाने में पीछे नहीं थे।

दिल्ली से मंगाई गई ‘लेज़र लाइट’ पूरे स्टेज को एक अलग ही रंग दे रही थी और मानो ऐसा लग रहा था कि साक्षात राम दरबार ही लगा हुआ हो।  सुरेश टेंट हाउस की सबसे बेहतरीन कुर्सियों को सिंघासन का अद्भुत रूप देने में मालिन चाची ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी और साथ ही साथ लगभग एक क्विन्टल गुलाब के फूलों का इंतज़ाम था जो धीरे-धीरे कर के प्रभु राम और माता सीता के ऊपर छोड़े जा रहे थे। जैसे-जैसे राम और सीता की जोड़ी आगे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे पथरचट्टी राम लीला मैदान और भी जीवंत होता चला जा रहा था।

जैसे ही प्रभु राम और सीता माता कुर्सी पर बैठे, लाइट चली गई, पूरे मैदान में घुप्प अँधेरा छा गया और चारो तरफ शोर गुल होने लगा। कोई बहुत बड़ी अनहोनी होने ही वाली थी कि झप्प से लाइट आ गई। अन्नू के कुशल प्रबंधन से ‘हैवी जेनेरेटर सेट’ का इंतज़ाम पहले ही कर दिया गया था और उसी वजह से पुनः लाइट का आगमन मात्र 10 सेकेंड में हो गया था।

माहौल एक बार फिर से भक्तिमय हो चला था। क्रम के अनुसार सबसे पहले DM साहब ने राम दरबार की पूजा की। बबलू इस सम्मान से बेहद खुश था और मन ही मन बब्बन एंड टीम को ये अवसर देने के लिए साधुवाद दे रहा था।

DM साहब के बाद SDM ,और फिर SSP साहब ने राम दरबार का पूजन किया। फिर बारी आयी ठाकुर साहब और ठकुराइन की।  ठाकुर साहब ने माथे पर टीका लगाते हुए प्रभु श्री राम के पैर छुए और ठकुराइन का हाल तो देखने लायक था। प्रभु श्री राम और माता सीता को देख-देख कर बार-बार वो भाव विभोर हो कर पैर छुए जा रही थी।

“जिज्जी अब बस करो पीछे बहुत लम्बी लाइन लग गई है”, बबलू अब थोड़ा झेप कर बोला।

धीरे-धीरे कर के पूरे क़स्बे ने प्रभु राम और माता सीता का सत्कार किया, और इस प्रकार से पथरचट्टी राम लीला कमेटी का एक और दिन समाप्त हो गया। अगले दिन बब्बन मित्र मंडली के इम्तिहान का सबसे कठिन पेपर आने वाला था और वो था दशहारे का मेला।

**

“आओ-आओ चीफ इंजीनियर साहब, हो गया तुम्हारा कॉलेज वाला प्रोजेक्ट?”, अन्नू अपने जूते उतार भी नहीं पाया था कि मिश्रा जी के कर्कश शब्द पूरे आँगन में गूंजने लगे, “यही सब लोफड़ई के लिए तुमको इंजीनियरिंग करवाई थी कि तुम मेला में लाइटिंग करते फिरो। पूरे क़स्बे में नाक कटवा दी इसने आज। नालायक! बेवक़ूफ़!”

“अरे बस भी करो, सुबह से बिना खाये पिए निकला है थोड़ा तो चुप करो”, मिश्राइन ने अन्नू का बचाव किया।

“तुम तो एकदम चुप ही रहो। इसी लबरई से एक दिन ये पूरे मोहल्ले का उठाईगीर बनेगा। सुबह से बिना खाये पिए निकला है तो क्या भारत रत्न दे दें इसको?”, मिश्रा जी ने मिश्राइन को डांटते हुए कहा।

मिश्रा जी थे कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रह थे। इधर अन्नू सिर झुकाये इस ताक में बैठा था कि जैसे ही मिश्रा जी मारने के लिए आगे बढ़ें और वो गली की तरफ भागे। उधर मिश्राइन पूरे जोर-शोर से अपने लाडले का बचाव करने में जुटी थी।

“जब से मेला से आये हैं, तब से पूरे मोहल्ले में मेरे बउवा के चर्चे हैं। गुप्ताइन ने कहा कि लड़का हो तो ऐसा। पप्पू की मम्मी भी बोल रही थी कि मिश्रा जी ने अच्छे संस्कार दिए हैं जो लड़का इंजीनियरिंग के पहले ही इंजीनियर बन गया”, मिश्राइन ने अपनी दलील रखी। बहरहाल मिश्राइन का ये बखान काम कर गया और अन्नू की पिलाई होते-होते बच गई।

इधर शेरू के घर में भी तारीफों के पुलिंदे बांधे जा रहे थे। शेरू की फोटो वाला पोस्टर, जो उसके मोहल्ले वाले चौराहे पर लगा था, शेरू की इज़्ज़त में इज़ाफ़ा कर रहा था। अब शेरू भी मोहल्ले के सम्मानित व्यक्तियों में गिना जाने लगा था। उधर बब्बन की भाभी को छोड़कर, बाक़ी सबने बब्बन की तारीफ की थी जो बब्बन की सालो की कुंठा को ख़त्म करने का काम कर रही थी।

“हाँ आईये आप अब यहाँ और अपनी आँखें खोल कर देखिये कि मेरे लाल की फोटो छपी है अखबार के सामने वाले पन्ने पर और साथ में आपकी भी”, सुबह-सुबह मिश्राइन की आवाज़ तेज़ होने के साथ-साथ ख़ुशी से भी लबरेज़ थी। “आईये न, अब कहाँ मुँह छुपाये बैठे हैं? कल तो पता नहीं क्या-क्या बोल रहे थे?”

मिश्राईन की ललकार को सुन मिश्रा जी भी चश्मा पहनते हुए आँगन में आये, “किसकी फोटो छपी है? दिखाओ!”

बब्बन, शेरू और अन्नू की फोटो टाइम्स ऑफ़ हिंदुस्तान के पेज को शोभायमान कर रही थी और लाइट चले जाने पर अन्नू द्वारा किया गया कौशल भी मुख्य रूप से छापा गया था। वैसे सारा काम ‘आटोमेटिक जनरेटर’ ने किया था लेकिन पत्रकार सुधाकर जयसवाल, जो अन्नू के मित्र के भैया थे, ने अन्नू के महात्यमय को उजागर करने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। साथ ही मिश्रा जी द्वारा सम्मानित होते हुए भी अन्नू की एक और फोटो भी बगल में दिख रही थी।

वैसे ख़ुशी तो मिश्रा जी को भी हुई लेकिन अपनी आदत के अनुसार उन्होंने अख़बार को मेज पर रखते हुए कहा, “फालतू है ये सब” और चाय का कप उठा कर चले गए। जाते-जाते थोड़ा मुड़े और अख़बार भी लेकर चले गए। वो बात अलग है कि दूसरे कमरे में जा कर मिश्रा जी ने बहुत ध्यान से अन्नू और खुद की फोटो देखी और मन ही मन बेहद खुश हुए।

कुल मिला कर चुन्नीगंज रामलीला कमेटी के सभी सदस्यों की इज़्ज़त में मेले की वजह से इज़ाफ़ा हुआ था। बस अब इंतज़ार था मुख्य आकर्षण, दशहरा के मेले का और चुन्नीगंज के रावण के दीदार का।

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सुबह सुबह 8 बजे पूरी कमेटी के लोग रामलीला मैदान के मंच पर पहुंच चुके थे। उस दिन के कार्यक्रम और सब की जवाबदारी की अंतिम समीक्षा करने के लिए सब वहाँ निर्धारित समय पर जुट गए थे। बब्बन, अन्नू, शेरू, सब लोग आज के दिन को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। बब्बन कुछ बोलता इसके पहले ही एक लौंडे ने धच्च करके एक मस्त छींक मारी ।

“लो हुआ अपशगुन”, अन्नू ने तपाक से कहा।

“अरे यार जिसको छींकना, पादना हो वो सब यहीं करो”, शेरू ने गुस्से में कहा।

“प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, हृदयँ राखि कोसलपुर राजा”, चलो-चलो गुस्साओ ना, कोई बात नहीं। बब्बन ने माहौल को शांत किया।

“अच्छा सुनो भाई 40 दिन की मेहनत के बाद आज वो दिन आ गया है, अपने क़स्बे की इज़्ज़त को और ऊपर ले जाना है। सबको अपना-अपना काम ईमानदारी से करना है”, बब्बन ने एक कुशल सेनापति की तरह किले पर अंतिम चढ़ाई के लिए अपनी टुकड़ी का मनोबल बढ़ाया।

बब्बन आगे की ज़िम्मेदारी को समझाने लगा, “गुड्डू और मुन्ना, तुम दोनों पर भीड़ नियंत्रण का जिम्मा रहेगा। पुलिस व्यवस्था और अपने लौंडों को हर जगह लगाओ जिससे कोई लड़ाई झगड़ा न हो। तुमको दो सिपाही मिलेंगे, दरोगा जी बोल रहे थे। और पिंटू और टनटन तुम पूरे मेला में घूमो और किसी भी गड़बड़ की आशंका में सीधा जाकर गुड्डू या मुन्ना भैया को बताना। जबसे हम लोगों ने फूलपुर वालों का डांस वाला प्लान चौपट किया है, तबसे सब खिसियाये  बैठे हैं”

“शेरू, तुम सिर्फ शाम के भंडारे पर ध्यान दो। बहुत बड़ा काम दिया है ठाकुर साहब ने। आठ-दस और लौंडों को रख लो अपने साथ”, बब्बन ने शेरू को उसकी जबाबदारी की गंभीरता दिखाते हुए कहा।

“और हम जा रहे हैं विधायक जी के यहाँ, पहले ठाकुर साहब को उनके घर से लेंगे फिर उनके साथ जा कर आमंत्रण दे कर आएंगे”, बब्बन ने अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट की।

“तो उठो सब लोग बोलो ‘जय श्री राम’”, ये बोलकर बब्बन ने अपनी आल्टो का दरवाजा खोला और बाक़ी सब भी अपना अपना काम लेकर वहाँ से चले गए।

सभी रंगरूट अपने-अपने कामों में लगे थे। दोपहर के दो बजने वाले थे और राम लीला मैदान में रावण के पुतले का अता-पता नहीं था। अमूमन रावण का पुतला दो हफ्ते से पहले ही बनना शुरू हो जाता था लेकिन इस बार रावण के पुतले का गुम होना चर्चा का विषय बनता जा रहा था। 

“बब्बन भैया रात को 8 बजे रावण जलना है और अभी तक यहाँ पर सिर्फ साफ़ सफाई का काम हो रहा है”, मोहल्ले के एक लौंडे ने बब्बन से पूछा।

“हाँ यार चिंता तो हमको भी हो रही है अब। ऐ उत्तम एक काम करो, दौड़ कर जाओ और फैक्ट्री में देख कर आओ कि अन्नू क्या कर रहा है। देर हो रही है बहुत”, बब्बन अपनी बात ख़त्म कर पाता कि इतने में मेन गेट से ट्रैक्टर्स का काफिला घुसा और सबसे आगे वाले ट्रेक्टर में अन्नू एक ज़िम्मेदार इंसान की तरह सबको  निर्देश दे रहा था। पीछे वाले ट्रैक्टरों में टोली के अन्य लौंडे पूरा इलेक्ट्रिकल का सामान ले कर आ रहे थे।

“ये लो आ गया अपना इंजीनियर रावण को लेकर”, बब्बन राहत भरी सांसों के साथ बोला।

“हाँ तो भैया चुन्नीगंज वालों तैयार हो जाओ, अब तक के सबसे अद्भुत और बेहतरीन रावण को देखने के लिए”, अन्नू ने ट्रेक्टर से उतरते हुए एक ज़बरदस्त हुंकार भरी और उस हुंकार में आत्मविश्वास भी पेलम पेल भरा हुआ था।         

“जय श्री राम”, बब्बन ये कहकर उस जगह की ओर चल पड़ा जहाँ रावण को खड़ा करना था।

“यार अन्नू लेट नहीं हो गए तुम?”, बब्बन ने पूछा।

“नहीं बब्बन भाई सब कुछ एकदम समय से हो रहा है, तुम लोड न लो और जा के और काम देखो”, अन्नू ने बब्बन की चिंता दूर करते हुए कहा।

यहाँ ये बताना ज़रूरी था कि ये सब अन्नू की रणनीति का हिस्सा था। रावण का निर्माण उत्तर प्रान्त सरकार की बंद पड़ी हुई फैक्ट्री में बेहद गोपनीय तरीके से हुआ था। दिल्ली वाली पार्टी का रुकने का प्रबंध भी वहीँ हुआ था क्यूंकि अन्नू को प्लान लीक होने का डर था।

“भाई अब फटाफट खड़ा कर दो रावण को अपने पैरों पर”, अन्नू ने दिल्ली वाली पार्टी को कहा।

काम धना-धन चालु हुआ और लगभग तीन घंटे में रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले खड़े हो चुके थे। वाकई अभी तक का सबसे उत्तम रावण बना था।  10 सिर, बड़ी बड़ी मूंछें, रौबीली आंखें और चौड़ी छाती।  ऐसा प्रतीति हो रहा था जैसे तीनो वहाँ साक्षात् खड़े थे और उनकी एक नज़र से कोई भी डर कर काँप जाये। 

कमेटी का अथक प्रयास वाकई सराहनीय था, लेकिन असली कलाकारी तो अभी बाक़ी थी। जैसे ही तकनीशियन ने LPG सिलिंडर का पाइप फिट किया, और पहले ट्रायल में ही सबकी वाह-वाही निकल गई। तीन नहीं पूरे दस के दस मुँह से आग निकल रही थी और रावण का विकराल रूप देख कर मानो ऐसा लग रहा था रावण का ये रूप आज पूरे ब्रह्माण्ड को ही भस्म कर देगा। आग के साथ-साथ आँखों में लाल रंग की लाइट वाकई  तीनो पुतलों की आँखों  में खून उतरने का एहसास करवा रही थी।

“वाह भाई वाह! बेहद उम्दा”, बब्बन ने अन्नू को गले से लगा लिया। अन्नू की मेहनत सच में काबिल-ए-तारीफ़ थी।

40 फुट का रावण इसके पहले चुन्नीगंज में कभी नहीं बना था, और ये बात पूरे क़स्बे में आग की तरह फ़ैल गई। पूरा क़स्बा रोमांचित हो रहा था। वहीं दूसरी तरफ फूलपुर तक ये बात फ़ैल गई कि चुन्नीगंज का रावण उनके रावण से 10 फिट बड़ा है। बब्बन मित्र मंडली के इस दांव से फूलपुर चारों खाने चित्त हो चुका था।

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सात बजने को हो आया और बाक़ी इंतज़ाम का जायज़ा लेने ठाकुर साहब मैदान में पहुँच गए। रावण की छाती पर  ठाकुर साहब का हाथ जोड़ कर निवेदन करता हुआ पोस्टर पूरे मैदान से दिख रहा था, और नीचे चुन्नीगंज विधानसभा का नाम देख कर किसी को कोई शक नहीं रहा कि इस बार ठाकुर साहब की नज़रें सिर्फ जिला पंचायत की सीट पर नहीं बल्कि लखनऊ के सियासी गलियारों में भी हैं।

ठाकुर साहब ने भी अपने बाल ऐसे ही सफ़ेद नहीं किये थे। पहले तो उन्होंने चंदा ऐसे ही दिया था लेकिन राम लीला की लोकप्रियता के बाद उन्होंने इसको अच्छे से भुनाने की योजना बना ली थी और बब्बन मित्र मंडल का सम्मान, भंडारे का ऐलान, ये  सब इसी योजना का हिस्सा था।

उसी पोस्टर के नीचे एक और पोस्टर लगा था जो पहले ही चर्चा का विषय बन चुका था, और वो पोस्टर था भंडारे का। रावण फूंकने के बाद पूरे मेले को मुफ्त में खाना खाने का निमंत्रण। ये वो ब्रम्हास्त्र था जिसने पूरे विरोधियों को चित्त कर दिया था। बब्बन मित्र मंडली भी ठाकुर साहब की इस उदारता से बेहद खुश थी क्यूंकि उनके इस प्रयास ने पूरे मेले को इतिहास के पन्नों में दर्ज़ कर दिया था।

ठाकुर साहब की लोकप्रियता भी बढ़नी निश्चित थी, क्यों कि क़स्बे के करीब चालीस हज़ार लोगों को खाना खिलाना कोई छोटी बात नहीं थी। बड़े-बड़े दानवीरों ने ऐसा नहीं किया था अब तक पूरे प्रदेश में। आश्चर्य की बात ये थी कि महज़ एक दिन में शेरू ने पूरा इंतज़ाम कर लिया। दो ट्राली आटा, दो ट्राली चावल, एक ट्राली दाल, एक ट्राली प्याज़ और सब्जी, तेल और कई कनस्तर शुद्ध घी लगने का अनुमान था, जो कि मैदान के पिछले हिस्से में एकदम तैयार था। टिंचू माइक वाले के माध्यम से पूरे क़स्बे में न्योता भी दिया जा रहा था। ठाकुर साहब की लोकप्रियता अचानक से चरम पर थी, वहीँ क़स्बे का हर गरीब उनको दुआएं देते नहीं थक रहा था।

“देखो ठाकुर साहब कितने भले आदमी हैं, पहले इतना बड़ा चंदा दिया और अब पूरे क़स्बे को खाना। भगवान् ऐसी आत्माओं का भला करे”, मालिन चाची बार-बार ठाकुर साहब को दुआएं दे रही थी।

धीरे-धीरे अब भीड़ बढ़ने लगी थी और रावण के आस-पास हज़ारों की भीड़ इकठ्ठा हो रही थी। इसी के साथ वो घड़ी भी नज़दीक आ रही थी जब बुराई पर सच्चाई की जीत के प्रतीक प्रभु श्री राम, रावण को जलाने वाले थे।  

पूरा मैदान खचा-खच भरा हुआ था और अपने-अपने नए कपड़ों के साथ बब्बन मित्र मंडली उस मंच पर आसीन हो गई जहाँ से राम जी रावण को जलाने वाले थे। शेरू ने काले रंग का पठानी सूट और ऊपर से एक सोने की चेन, बब्बन ने सफ़ेद रंग का कुर्ता पैजामा और अन्नू ने लाल रंग की हुड और काले रंग की जीन्स पहन रखी थी। सब के सब एक दम हीरो और हाँ सबकी छाती पर सुनहरे रंग का कमेटी वाला चमकीला बिल्ला अलग ही रौब दे रहा था।

“अबे अन्नू चलो चाट खा कर आते हैं यार, अभी रावण को स्वाहा होने में थोड़ा समय है”, शेरू ने अन्नू का हाथ पकड़ के मंच के नीचे चलने का इशारा किया।

“हाँ भाई चलो, विनोद चाट वाले की चाट खा कर आते हैं। सुना है मेले में काजू किशमिश डाल के चाट खिला रहा है विनोदवा”, अन्नू ने मंच से नीचे उतरते हुए कहा। और दोनों विनोद चाट भण्डार के स्टाल पर पहुँच गए।

“हाँ विनोद चाचा, बढ़िया सी टिक्की चाट खिलाओ”, शेरू ने कहा।

“अरे एकदम मस्त चाट खिलाएंगे शेरू भैया। क्या मेला लगवाए हैं आप लोग। पूरा क़स्बा तारीफ़ कर रहा है। सन 80 से चाट की दुकान लगा रहे हैं लेकिन इतना ज़बरदस्त मेला और इतनी भीड़ नहीं देखी कभी। नाम कर दिया आपने क़स्बे का पूरे जिले में। और अन्नू भैया आपकी इंजीनियरिंग की पढाई तो कमाल की है। क्या लाइटिंग करवाई है, रावण देखो तो ऐसा लग रहा है कि बस बोल ही देगा अभी। मिश्रा जी ने भी बहुत पुण्य किए होंगे जो आप जैसा लड़का मिला”, विनोद चाचा की बड़ाई से दोनों का चाट खाने का मन मानो ख़त्म ही हो गया हो।

“क्या इंसान को इतनी इज़्ज़त मिलती है?”, अन्नू और शेरू एक दूसरे को देखते हुए आँखों-आँखों में ही पूछ रहे थे।

दोनों बार-बार यही सोच रहे थे और आगे कुछ बोलते कि एक बेहद प्यारी आवाज़ ने दोनों के बीच हो रही आँखों वाली बातों में दखल दे दी, “चाचा दो टिक्की चाट देना, एक में खट्टी वाली चटनी ज्यादा डालना और एक में दोनों को मिला कर देना”

सुरीली आवाज़ को लौंडे मुड़ कर ना देखे ऐसा हो ही नहीं सकता था। धानी रंग के चूड़ीदार चमकीले सूट में लगभग साढ़े पाँच फिट की लड़की, हाई हील पहन कर अन्नू के बगल में खड़ी थी। उसके साथ में हल्के हरे सूट में एक और लड़की उसके साथ चाट खाने को बेताब थी।

विनोद चाचा ने विशिष्ट व्यक्तियों अर्थात अन्नू और शेरू के चाट का ‘आर्डर’ पहले लेते हुए दोनों को शायद सुना भी और थोड़ा अनसुना भी कर दिया।

“अरे चाचा आपको बोला था कि एक में खट्टा ज्यादा करना, लेकिन आप तो मीठी वाली चटनी ज्यादा डाल रहे हैं”, धानी सूट वाली लड़की ने विनोद चाचा को बीच में ही टोका।

“अरे बिटिया ये तुम्हारी चाट नहीं है, पहले भैया लोगों की चाट बनेगी उसके बाद तुमको चाट मिलेगी”, विनोद चाचा ने बिना सिर उठाये अपनी सफाई दी। 

“अरे चाचा जल्दी करो, जाना है हम लोगों को, रावण भी जलने वाला है”

“अरे बिटिया अभी समय है। इंजीनियर साहब और अध्यक्ष जी दोनों यहीं खड़े हैं तो रावण कैसे जल जायेगा?”, विनोद चाचा ने चाट का प्लेट अन्नू की तरफ बढ़ाते हुए बोला और लड़कियों को भी इशारों में विशिष्ट व्यक्तियों से रूबरू कराया।

कोई कुछ बोल पाता कि शेरू ने रौब झाड़ने के लिए कहा, “अभी और 40-45 मिनट लगेंगे आप लोग आराम से चाट खाओ। और अगर आप बोलो तो रावण को और 10-15 का जीवन दान दे दें?”

“नहीं-नहीं इतने बड़े एहसान के तले हमें न दबाएं”, धानी सूट वाली लड़की ने पलट कर जबाब दिया और दोनों लड़कियां हंसने लगी। इसी बीच अन्नू उन दोनों को घूरने लगा और लगभग 10-15 सेकंड घूरने के बाद हरे सूट वाली लड़की ने तेज़ी से कहा “देखो क्या ज़माना आ गया है ऐसे खुलेआम घूर रहा है ये लड़का?” लड़की की ऐसी आवाज़ से अगल-बगल के लौंडे ना आए ये भी नहीं हो सकता।

3 -4 लौंडों ने थोड़ा हीरो बनने की कोशिश की तो शेरू ने एक का कॉलर पकड़ कर कहा, “यहीं गाड़ देंगे खोद के, ज्यादा फैंटम ना बनो समझे। और हाँ मैडम आप थोड़ा न आराम से बात कीजिये। मेरे दोस्त पर क़स्बे की हर लड़की मरती है समझे? और हाँ बे अन्नू तुम्हे कोई और नहीं मिली घूरने के लिए?”

ये बात तो जाहिर थी कि ये लौंडे किसी दूसरे क़स्बे के थे वरना कम से कम दशहरा के बाद अब हर कोई शेरू और अन्नू को जानता था।

“अबे ये अंजुम है, अंजुम”, ये नाम सुन कर शेरू को 3-4 सेकंड तक कुछ समझ नहीं आया और जैसे ही समझ आया शेरू एक झटके से अंजुम की तरफ देखा और फिर देखता ही रह गया।

वही खूबसूरती, वही नज़ाकत, वही अदा, और आँख के थोड़ा नीचे वाला काला तिल, शायद अंजुम के गोरेपन से कुछ ज्यादा ही काला दिख रहा था। अब बाल छोटे हो गए थे,  कमर अब थोड़ी पतली हो गई थी और चेहरे के नूर में जवान उम्र की ताज़गी साफ़ दिख रही थी। ऊँची हील में एक खूबसूरत सी दिखने वाली लड़की अब अचानक शेरू को और भी खूबसूरत वाली पूजा बत्रा लगने लगी थी। शेरू उधर रूपनगर में खोया ही हुआ था कि धानी सूट वाली लड़की, जिसकी पहचान अब अंजुम के रूप में हो चुकी थी, अन्नू से पूछा “तुम मेरा नाम कैसे जानते हो?”

“अरे अंजुम हम अन्नू और ये है शेरू। भूल गई क्या हम लोगों को। कैंप में मिले थे”, अन्नू ने थोड़ा याद दिलाने की कोशिश की।

यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि शेरू और अंजुम और अन्नू और शिखा कैंप के बाद उनलोगों का एक-दो बार ही मिलना हो पाया था। मगर, आदतन क़स्बे के लौंडे इतनी सी मुलाकात को प्यार समझ लेते थे। इसी आदत के अनुसार शेरू और अन्नू  भी अंजुम और शिखा को अपना-अपना प्यार समझते थे। चूँकि अन्नू थोड़ा बेफिक्र मिज़ाज़ का था तो वो प्यार-व्यार जल्दी भूल गया, लेकिन शेरू के 4 -5 सच्चे प्यारों में अंजुम सबसे ऊपर थी। उधर स्कूल ख़त्म करने के बाद अंजुम दिल्ली चली गई थी आगे की पढाई करने के लिए और मोबाइल फ़ोन की अनुपस्थिति में ये बात शेरू को बता नहीं पायी थी। शेरू आज तक ये समझता था कि ‘कुछ तो मज़बूरियां रही होंगी, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता’।

चलिए, वापस चाट की दुकान पर आते हैं।

“अच्छा-अच्छा, हाँ यार अन्नू कैसे हो तुम?”, अंजुम की आँखों में ख़ुशी साफ झलक रही थी।  

अपनी जगह अन्नू का नाम पहले सुन कर शेरू को बुरा लगता लेकिन अन्नू के सौ खून शेरू इससे पहले भी माफ़ कर रखे थे तो ज्यादा बुरा नहीं लगा।

“और शेरू तुम तो एकदम बदल ही गए हो, और ज्यादा हैंडसम भी हो गए हो”, अंजुम का इतना कहना था कि शेरू की आवाज में रौनक आ गई और शेरू ने तेजी से बोला, “विनोद चाचा चार चाट बनाओ और उधर कुर्सी के पास भिजवाओ जल्दी”

“How are you अंजुम?”, शेरू ने एक कुर्सी आगे कर के बैठने का इशारा करते हुए कहा।

“मैं अच्छी हूँ शेरू। तुम तो भूल ही गए होगे हमको। अन्नू अगर नहीं पहचानता तो बताओ बगल से निकल जाते हम लोग एक दूसरे से”, अंजुम ने बहुत ही प्यार से कहा।

शेरू बोलना तो चाहता था, “जैसे सूरज रोशनी को भूल नहीं सकता, शायर एक शायरी को नहीं भूल सकता और चोर पुलिस को नहीं भूल सकता, वैसे ही हम तुमको नहीं भूल सकते हैं अंजुम”। लेकिन हकीकत में शेरू ने कहा, “अरे नहीं अंजुम तुमको कैसे भूल सकते हैं। तुम बहुत ‘गुड लुकिंग’ हो गई हो अब तो और अच्छी लग रही हो”

“Thank you शेरू”, इतना कहते-कहते अंजुम ने शेरू के कंधे पर हाथ रखा।

कंधे पर हाथ, ये पूरा 44000 वाल्ट के पॉवर हाउस के जैसा था। शेरू का तन मन और बदन सब कुछ झनझना चुका था और पुराना प्यार, जो मरा नहीं था बस हल्का बेहोश था, पूरी तरह से जाग चुका था।

“अच्छा तो तुमने भी हमें नहीं पहचाना अन्नू?”, हरे सूट वाली लड़की ने इधर अन्नू से पूछा ।

“नहीं, sorry नहीं पहचान पाए”, अन्नू ने कहा

“अरे मैं शिखा हूँ”, हरे सूट वाली लड़की ने कहा।

“मेरा भी माल मिल गया”, ऐसा अन्नू ने मन ही मन में कहा।

“अरे शिखा तुम तो बिलकुल बदल गई हो यार”, अन्नू ने अपनी आखों में चमक के साथ कहा।

“तुम भी बदल गए हो अन्नू और सही बोलूं तो बहुत स्वीट भी हो गए हो”, ये बोलते हुए शिखा ने अन्नू का दायाँ गाल नोच लिया।

उधर कंधे पर हाथ, और इधर गाल में चिंगुटि। दिल्ली की लड़कियों ने चुन्नीगंज के लौंडो के ज़ज्बातों में तूफ़ान ला दिया था। दृश्य  ऐसा था कि विनोद चाट वाला भी अपनी चाट पर ध्यान न देकर गाल पकड़म पकड़ाई पर ध्यान दे रहा था। वो तीन-चार लौंडे जो अंजुम और शिखा के आह्वाहन पर अचानक प्रकट हो गए थे, इस दृश्य के बाद वहीं धरती में समां जाना चाह रहे थे। बता दें, इतनी खूबसूरत लड़कियों के सामने अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए ये लौंडे वहीं आस-पास ही भटक रहे थे।

उनके अलावा जो भी और लोफड़ लौंडे जमा हुए थे वो भी सकते में थे, क्यों कि चुन्नीगंज में कोई लौंडा अगर किसी लड़की को गाड़ी के पीछे बैठा के घुमा ले तो वो चर्चा हफ्ते भर तक रहती है। ऊपर से घूमने वाले लौंडे को हीरो से कम नहीं माना जाता। यहाँ तो साला खुले आम गाल नोचे जा रहे थे। पूरा युवा वर्ग अन्नू और शेरू को मोहब्बतें सिनेमा का  जिमि शेरगिल और जुगल हंसराज समझ रहा था और अंजुम और शिखा में  किम शर्मा और प्रीति जंघयानी दिख रही थी। और उनकी नज़र में वे लोग मानो मेले में खड़े हो कर चुन्नीगंज की परम्परा, प्रतिष्ठा और अनुशासन को खुलेआम चुनौती दे रहे थे।

“और बताओ क्या चल रहा है?”, शिखा ने अन्नू से पूछा।

“कुछ नहीं बस इंजीनियरिंग चल रही है यूनाइटेड कॉलेज से तुम बताओ”, अन्नू ने चाट खाते खाते कहा।

“मैं भी इंजीनियरिंग कर रही हूँ दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल में और तुम?”, शिखा ने बहुत ही गर्व से कहा। 

“अरे वाह हम भी एलेक्ट्रिकल से”, अन्नू ने भी आँखों में चमक के साथ कहा फिर एक चम्मच चाट मुँह में रख कर पूछा, “छुट्टी पर आयी हो क्या?”

“अरे नहीं यार, HAL में ट्रेनिंग करने आयी हूँ”, शिखा ने बताया।

“अच्छा अंजुम तुम भी इंजीनियरिंग कर रही हो क्या?”, शेरू ने भी मेल जोल बढ़ाया।

“नहीं शेरू, मैं पत्रकारिता का कोर्स कर रही हूँ जामिया से”, अंजुम ने कहा।

“यार हम तो बिजनेस में लग गए”, कोई कुछ पूछता, इससे पहले ही शेरू ने जवाब दे दिया।

**

उधर उनलोगों की बातें गरम हो रही थी, इधर बब्बन गरम हो रहा था।

“यार साला ये दोनों फिर गायब”, बब्बन ने मंच पर निगाहें दौड़ाते हुए मन ही मन कहा। “अरे पिंटू तुमको अन्नू और शेरू दिखे हैं क्या?”

“हाँ बब्बन भैया दोनों विनोद चाट वाले के यहाँ दो लड़कियों के साथ चाट खा रहे रहे हैं। हम भी वहीं बगल में बुढ़िया के बाल खरीद रहे थे”, पिंटू ने अपना ख़बरी का काम मुस्तैदी से करने का प्रमाण दे दिया।

“साले ये दोनों कबर में पैर लटकाये होंगे न तब भी लौंडियाबाजी से बाज़ नहीं आएंगे। शर्म भी नहीं आती दोनों को कि पूरा मेला देख रहा है। भगवान् का काम काज है तो थोड़ा सात्विक रहे। लेकिन नहीं, इन दोनों की ठरक हमेशा सिर पर ही रहती है। तब से ठाकुर साहब की आव-भगत में हम अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, हद्द है!”, ये सब बोलते हुए बब्बन सीढ़ियों से जैसे ही उतरा कि अचानक उसकी किसी से टक्कर हो गई।

“माफ़ करना बहन जी, जल्दी में था, गलती से हो गया”, बब्बन ने बिना उस लड़की का चेहरा देखे टक्कर की माफ़ी मांग ली।

“Its OK, कोई बात नहीं”, लड़की ने बब्बन को माफ़ करते हुए कहा। किसी शायर ने खूब कहा है,

“नकाब में भी पहचान लेते हो हज़ारों के बीच

इन्ही आँखों से तो शुरू हुआ था इश्क़ हज़ारों के बीच”

कहते हैं न कि किसी से जब सच्ची मोहब्बत हो तो आप उसको, उसकी आवाज़ को या उसकी सांसों को भी हज़ारों के बीच भी पहचान लेते हैं। वैसा ही ये वाला “Its OK” कोई आम “Its OK” नहीं था। दबी भावनाओं को झंझोरते इन दो शब्दों ने बब्बन की धड़कनों को थोड़ी देर के लिए रोक दिया था और उसका शरीर उसी जगह जम सा गया था। कुछ क्षण के बाद उसकी धकड़न शताब्दी ट्रैन की तरह दौड़ने लगी। इम्तिहान के परिणाम को देखने के लिए जैसे बच्चे धीरे-धीरे अपनी आँखे खोलते हैं, बब्बन ने भी अब तेज़ धड़कन के साथ धीरे-धीरे पीछे मुड़ कर उस आवाज़ का दीदार करना चाहा। वहाँ सामने सुधा बड़ी ही आत्मीयता वाली नज़रों से बब्बन को देखे जा रही थी। दोनों ने ही आँखों ही आँखों  में न जाने कितनी बातें कर ली थी।

10-12 सेकण्ड्स के बाद बब्बन ने कहा “वो तुमको देखा नहीं था तो मुँह से ‘बहनजी’ निकल गया। Sorry! तुम्हे चोट तो नहीं लगी?”

“अरे नहीं कोई बात नहीं। आप कैसे हैं बब्बन जी?”, सुधा ने पूछा।

“तुम्हारे बिना कैसे हो सकते हैं सुधा?”, बब्बन का मन तो यही बोलना चाह रहा था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया और कहा, “ठीक ही हैं, तुम कैसी हो? इस लाल सूट में बहुत अच्छी लग रही हो”

“Thank you, आप भी बहुत अच्छे लग रहे हैं। पिछले आठ-दस दिन से रोज़ आपकी फोटो निकलती है अखबार में। मैंने सब को काट के अच्छे से रखा है”, ये बोल कर सुधा थोड़ी शरमाई और सुधा के मुँह से ये बातें सुन कर बब्बन बेहद खुश हो रहा था।

“अरे ऐसे ही बस जो अच्छा लगा कर दिया और राम जी के आशीर्वाद से अभी तक सब अच्छा ही रहा। बस आज का अंतिम कार्यक्रम अच्छे से निपट जाये। खैर ये सब छोड़ो, तुम कैसे आयी मेले में? अकेले या किसी के साथ?”, बब्बन ने इधर-उधर देखते हुए कहा।

तभी पीछे से एक अनजान आदमी ने आवाज़ लगाई, “अरे सुधा कब से तुमको ढूंढ रहा हूँ”

“अरे साला सुधा का आदमी है क्या ये”, बब्बन के दिल पर किसी ने ज़ोर का घूँसा मार दिया हो जैसे। तुरंत बब्बन ने सुधा को ‘स्कैन’ किया, लेकिन मांग में सिन्दूर और गले में मंगल सूत्र नहीं दिखा। “अरे यार किसी और धर्म में शादी कर ली क्या? अरे यार, हमको हिंट देती तो हम ही भगा कर शादी कर लेते। हद्द है यार, साला एक से प्यार हुआ वो भी नहीं मिली, और शादी भी कहाँ की, किसी दूसरे धरम में”, बब्बन के दिमाग में ये बातें चल ही रही थी कि सुधा ने कहा, “मेरे जीजा जी मुझे ढूंढ रहे हैं”।

जितनी ख़ुशी अद्धी की आस में बैठे एक बेवड़े को मुफ्त में खम्भा मिलने की होती है उससे कहीं ज्यादा अपना बब्बन खुश था।

“अरे हम जानते थे कि सुधा मर जाएगी लेकिन किसी और से और दूसरे धरम में तो बिलकुल भी शादी नहीं करेगी”, बब्बन ने मन ही मन खुद की दलील को खुद ही खारिज कर दिया।

“आपने शादी कर ली क्या?”, सुधा ने थोड़ा मायूस होते हुए पूछा।

“अरे नहीं, अभी नहीं”, बब्बन के मुँह से ‘नहीं’ सुनकर सुधा भी बेहद खुश हुई।

“अरे सुधा, ये बब्बन है न”, जीजा जी ने पूछा।

“नमस्ते जीजा जी, मगर आप हमको कैसे जानते हैं”, बब्बन ने अभिवादन किया। तब तक वहाँ सुधा की दीदी भी आ गयी और उनका भी बब्बन ने अभिवादन किया।

“आज कल तो चुन्नीगंज के सभी ‘न्यूज़ पेपर’ में आप ही छाए हुए हैं। कौन नहीं पहचानता आपको। और काफी तारीफ भी सुनी है आपकी सुधा के मुँह से”, जीजा जी ने बड़े तहज़ीब के साथ कहा।

बब्बन ने जीजा जी की पूरी बात में सिर्फ इस बात को ध्यान से सुना ‘सुधा आपकी तारीफ करती है’।

“अरे सुधा चलो, रावण दहन का समय हो रहा है। कुर्सियां जल्दी भर रही है, नहीं तो फिर पीछे खड़े-खड़े ही देखना होगा”, दीदी ने बढ़ती भीड़ की तरफ देखते हुए कहा।

“अरे दीदी, आप लोग सब ऊपर मंच पर बैठिये। वहाँ से सब साफ़ दिखेगा”, बब्बन ने इसी बहाने सुधा के साथ कुछ और समय बिताने का मौका ढूंढ लिया।

“शुक्रिया बब्बन जी। मगर वहाँ तो VIP लोगों को ही जाने की अनुमति है”, जीजा जी ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।

“आप लोग सुधा के दीदी और जीजा जी हो, इससे बड़ा VIP कौन होगा”, बब्बन ने उनका मान बढ़ा कर ये स्पष्ट कर दिया कि उस दिन की घटना के बाद भी सुधा और उनके घर वालों के प्रति उसके अंदर कोई द्वेष नहीं था।

“अरे टनटन इधर आओ, दीदी और जीजा जी को मंच पर ले जाओ और एक अच्छी जगह पर बैठा दो, हम लोग पांच मिनट में आते हैं”, बब्बन ने दोनों को मंच पर भेज कर कबाब में से हड्डी निकाल दी और सुधा के साथ अपनी बातों को जारी रखा।

“आपने मेले में कुछ खाया कि नहीं। सुना है बहुत कुछ लगा है। मेले के इंतज़ाम के कारण कुछ देख ही नहीं पाया। हमारे दोस्त लोग हमको काम में अकेला छोड़ कर कहीं गुलछर्रे उड़ा रहे हैं”, बब्बन ने बातों की श्रंखला को जारी रखा।

“हाँ, मद्रासी डोसा खाया। बहुत ही बढ़िया बनाया था। मसाला डोसा और नूडल डोसा खाया। पहले भी उसका डोसा एक दो बार खा चुके हैं हम, बहुत अच्छा बनाता है”, सुधा ने दुपट्टे की छोर को उँगलियों में लपेटते हुए कहा।

“आज तो समय नहीं है, अगले मंगलवार को एक बार फिर खिला देंगे तुमको”, बब्बन ने सुधा को एक छोटी सी डेट पर चलने का आमंत्रण दे दिया।

“नहीं”, सुधा ने तुरंत जवाब दिया।

“अरे, क्यों नहीं, क्या दिक्कत है? तुमने सीधे मना कर दिया। डोसा नहीं खाना है तो पानी के बताशे खा लेना। या जो मन हो वो खा लेना”, बब्बन ने झुंझलाते हुए कहा।

“अरे नहीं, हमारा कहने का मतलब है कि हम मंगल को प्याज-लहसुन नहीं खाते हैं”, सुधा ने बब्बन की ग़लतफहमी दूर की।

“अच्छा अच्छा, हमको लगा कि….. चलो कोई बात नहीं बुधवार को हम इंतज़ार करेंगे तुम्हारा”, बब्बन अपनी बात ख़त्म कर पाता कि शेरू ने  बीच में बोला, “अरे तो मंगल को हमको और अन्नू को खिला देना, हम लोग प्याज लहसुन खाते है”, इतना सुन कर सुधा झेंप गई और बब्बन भी थोड़ा शर्मा गया।

“अबे तुम लोग कहाँ रह गए थे, पिंटू बता रहा था, कुछ लड़कियों को छेड़ रहे थे वहाँ, कुछ तो शर्म करो”, बब्बन शेरू और अन्नू को डाँटते हुए बोला। तभी दोनों के पीछे दो लड़कियाँ दिखी।

“अरे बब्बन, कोई छेड़खानी नहीं हुई थी, ये अंजुम और शिखा है। याद है NCC में हम लोग मिले थे”, शेरू आगे बढ़ कर बोला और फिर सुधा को देख कर पलट गया। शेरू को मन ही मन अजीब लगा और उसने सोचा कि कहीं सुधा उसपर चिल्ला न दे।

लेकिन सुधा ने शेरू को असहज देखते हुए कहा, “अरे शेरू जी, आप यूँ मुँह मत फेरिए। आपकी कोई गलती नहीं थी”

“अरे सुधा भाभी अब क्या बताये? कुछ नहीं है मेरे पास बोलने को”, शेरू ने सिर झुका कर बोला।

“अरे शेरू इतना मत सोचो तुम। बहुत अच्छा लगा आप लोगों से मिल कर। बात चीत अब बाद में करेंगे, पहले मंच पर चलते हैं। कार्यक्रम शुरू होने वाला है”, बब्बन ने मुस्कुराते हुए कहा।

पल भर में वहाँ एक अलग ही माहौल बन गया। माहौल तो पूरा भक्तिमय था, मगर सब के कानो में धीमी-धीमी शहनाई बज रही थी। सब अपना-अपना जोड़ा बना के चल रहे थे। पूरा जत्था मंच तक पहुँच चुका था।

अंजुम, शिखा, शेरू, अन्नू और बब्बन मंच पे चढ़ चुके थे। सुधा ऊपर जा रही थी कि अचानक से वो थोड़ा सकपका गई और उसके कदम रुक गए। वहाँ मंच के एक कोने में पाठक परिवार बैठा था। वो इन्हे नहीं देख पा रहे थे मगर तभी ऊपर आवाज़ आयी, “अरे तुम शुक्ला जी की छोटी लड़की हो न, क्या नाम है तुम्हारा? सुधा? है न?” वो आवाज़ और किसी की नहीं बल्कि ठाकुर साहब की थी।

“जी अंकल नमस्ते, मैं सुधा ही हूँ”, सुधा ने थोड़ा घबराते हुए जवाब दिया।

“तुम जानती हो या इनमे से किसी को?”, ठाकुर साहब ने बब्बन, अन्नू और शेरू की तरफ इशारा करते हुए कहा। ठाकुर साहब की इस बात का जवाब किसी को सूझता कि सुधा ने तपाक से जवाब दिया, “अंकल ये भैया हमारे जीजा के दोस्त हैं और अभी मेले में मिले तो हम सबको जिद्द कर के ऊपर मंच पर ले आये”

जवाब तो मौके के हिसाब से सटीक था, लेकिन सुधा बब्बन के जगह शेरू या अन्नू को भी भैया बना सकती थी। सुधा का ‘भैया’ वाण बब्बन को मूर्छित करने ही वाला था मगर बब्बन ने जैसे तैसे अपने आप को सम्हालते हुए ठाकुर साहब की तरफ देख कर ‘हाँ’ बोला।

“तुम कैसे जानते हो इनके जीजा जी को?”, ठाकुर साहब ने बब्बन से पूछा।

“अरे पहले रावण को जला लिया जाए तब बाक़ी की कहानी बताते हैं आपको”, ठाकुर जी की बात को काटते हुए बब्बन ने कहा फिर उसने कमेटी वाले को इशारा कर के कहा, “राम जी को बुलाया जाये”

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उधर मेकअप रूम में आज अलग ही माहौल था।

“मन कर रहा है कि गाल नोच के पप्पी ले लूँ आपके”, मिट्ठू ने एक बार फिर बबलू के चेहरे को अंतिम बार संवारते हुए कहा।

“दूर रहो मेरे से समझे, ऐसे कैसे पप्पी ले लोगे हमारी यार तुम? हैं?”, बबलू ने गुस्से में कहा।

“अरे ये गुस्सा रावण को जलाने में दिखाना”, जाते-जाते मिट्ठू ने बबलू के पेट में चिकोटी काट ही ली।

“आप बहुत सुन्दर लग रहे हैं”, ऋतु ने बबलू को देख कर कहा।

“अच्छा, सुन्दर तो आप भी लग रही हो। हमारी जोड़ी काफी अच्छी लगेगी”, बबलू ने बस यूँ ही एक दाव फेंका।

“जी मैं समझी नहीं”, ऋतु ने थोड़े संदेह से पूछा।

“अरे नहीं, मेरे कहने का मतलब था, मंच पर हम दोनों की राम-सीता वाली जोड़ी काफी ख़ूबसूरत लगेगी”, बबलू ने अपने शब्दों के खेल का शानदार प्रदर्शन करते हुए अपना बचाव कर लिया। ऋतु इस जबाब पर कुछ प्रतिक्रिया देती कि इतने में ठकुराइन का प्रवेश हुआ।

“हाय मेरा बबलू, साक्षात् राम लग रहा है। नज़र न लगे”, इतना कहते हुए ठकुराइन ने 100 के नोट से बबलू की निछावर कर के बगल में खड़े माली को दे दिया। 100 के नोट की गर्मी का ही असर था कि माली सीधे बबलू के पैरों पर ‘जय श्री राम’ बोलते हुए गिर पड़ा। 

तभी कमेटी का एक लड़का सीता माता को स्टेज पर बनी अशोक वाटिका की तरफ जाने का इशारा करने लगा। जैसे ही सीता माता स्टेज पर आयी कि मानों पूरा क़स्बा एक स्वर में ‘जय सीता माता’ के जयकार लगाने लगा।

इसी बीच रावण के पुतले में भी सभी लाइट जलने लगी थी। 10 के 10 मुँह से आग निकल रही थी। ऐसा रावण का भयानक स्वरुप शायद इससे पहले असली रामायण के युद्ध के समय रावण का हुआ होगा। मुँह से आग निकलना, आँख में लाल लाइट जलना, लेज़र लाइट और संगीत का सही समन्वय और साथ में मैदान में हज़ारों लोगों के कंठ से उठ रही  ‘जय श्री राम’ का उद्घोष। बस ये अनुभव जीवन में एक बार ही होता है। अद्भुत, अप्रतिम, अनुपम एहसास वहाँ पर खड़े हुए एक एक इंसान को हो रहा था।

उधर प्रभु श्री राम भी अब रामायण के सबसे महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए चल पड़े थे। मेकअप रूम से बाहर निकलते ही पूरा क़स्बा हाथ जोड़ अपनी अपनी जगह खड़ा हो गया। दृश्य इतना मोहक था कि एक पल को लगा कि स्वयं श्री राम उतर आए हैं। राम जी के साथ-साथ क़स्बे के छोटे-छोटे बच्चे वानर का रूप धारण किये उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। उनका नेतृत्व पिंटू कर रहा था और अपने दोस्त का मनोबल बढ़ाने टनटन अंगरक्षक की तरह चल रहा था।

चलते-चलते प्रभु श्री राम मंच के बीच में पहुँच चुके थे, पूरा मैदान ‘जय श्री राम’ के जयघोष से ओतप्रोत हो रहा था। प्रभु श्री राम और लक्ष्मण की आरती हुई और जैसे ही श्री राम वाण निकालने  के लिए हाथ बढ़ाये, अन्नू ने रुकने को कहा और माइक की ओर भागा।

“अरे राकेश, रावण के पुतले के सीने से ठाकुर साहब का पोस्टर तो हटाओ, आज के अन्न-दाता हैं चुन्नीगंज के वो”, अन्नू ने रावण के साथ-साथ ठाकुर जी को स्वाहा होते होते बचा लिया। राकेश, जो पुतला बनाने का कारीगर था, ने झट से एक डोर खींची और पोस्टर को नीचे उतार दिया।

अब शुभ मुहूर्त भी था, मंच भी तैयार, श्री राम ने तरकश से एक वाण निकाला और पुतले की तरफ उस वाण को छोड़ दिया। वाण पतले तार के माध्यम से सीधा रावण की नाभि पर जा लगा और पलक झपकते ही रंगीन आतिशबाजी के बीच तीनो पुतले धू-धू कर जलने लगे। अच्छाई की बुराई पर जीत सबको दिख रही थी। ठाकुर, ठकुराइन, अन्नू, शेरू सभी ने हाथ जोड़ रखे थे।

और इस प्रकार रावण का अंत होते ही, दशहरा भी अपने अंतिम पड़ाव की तरफ बढ़ चला था। सबके मन में सफल दशहरे का संतोष साफ़ झलक रहा था। मगर, मंच पर उपस्थित बब्बन की भाभी और माँ आपस में ये बात कर रहे थे कि सुधा का यहाँ मंच पर होना महज़ संयोग था या बब्बन की कोई योजना। माताजी तो इस बात से खुश हो रही थी कि कहीं दोनों कि गाड़ी फिर से आगे बढ़े तो अच्छा है। कौशल्या ऐसे किसी भी संयोग से थोड़ी जल रही थी। खुद को सांत्वना देने के लिए सोच रही थी कि सुधा कितनी बेशरम है, जिसको कुछ महीने पहले ठुकरा कर गयी थी, आज उसके साथ मंच में सारी दुनिया के सामने खड़ी है।

खैर ये लोग तो अपनी अपनी सोच में व्यस्त थे, बाक़ी जनता मैदान के पिछले हिस्से में ठाकुर साहब द्वारा आयोजित भंडारे का मज़ा ले रहे थे। मंच पर उपस्थित सभी लोग भी धीरे-धीरे कर के नीचे उतरने लगे और भंडारे के तरफ बढ़ने लगे।

ठाकुर साहब की अगुआई करते हुए बब्बन और शेरू भी मंच से नीचे उतर रहे थे।

“अध्यक्ष जी, मान गए आपको। क्या सफल कार्यक्रम किया है आपने। हम बहुत प्रभावित हैं आपसे। आप 2-3 दिन आराम करिये और उसके बाद आइये हमसे मिलने। कुछ सोचा है मैंने आपके लिए”,  बात करते-करते सब मैदान के पिछले हिस्से में बने VIP कोने में पहुंचे। जहाँ बाक़ी लोग खुले मैदान में छोटी-छोटी टुकड़ियां बना कर खड़े-खड़े भंडारा का लुत्फ़ उठा रहे थे, वहीँ VIP मेहमानों के लिए कुछ मेज और कुर्सियां लगी थी। उसपर लगा सफ़ेद मलमल का कपडा दूर से ही चमक रहा था। कुछ कार्यकर्ता वहाँ VIP मेहमानों को भंडारा खिलाने के लिए तैयार थे।

भंडारे का भी आयोजन बहुत ही शानदार था। इतनी बड़ी भीड़ को खिलाने का काम शेरू के देख रेख में हो रहा था। लोगों को पहले से ही पर्चियां दे दी गयी थी जिसमे सब को पंद्रह मिनट के फासले में बांटा था। सब को अपने निर्धारित समय पर वहाँ आना था, एक द्वार से अंदर जाकर अपने थाली में भंडारा का पकवान ले कर दूसरे द्वार से एक बड़े मैदान में चले जाना था। इस तरह इतनी बड़ी भीड़ को आसानी से नियंत्रित किया जा रहा था। हाँ यहाँ थाली में दोबारा खाना लेने का की सुविधा नहीं थी। तो चुन्नीगंज के लोग थाली भर-भर के खाना ले रहे थे, और ठाकुर साहब की जय-जयकार कर रहे थे।

उधर लगभग सारे कार्यकर्ता और उनके परिवार वाले आज VIP मेहमान थे। उनके अलावा जिले के कुछ गणमान्य भी इस खास इंतज़ाम में शिरकत किये थे। ठाकुर साहब ने पूरे इंतज़ाम का जायजा लिया और गैस की शिकायत के कारण सिर्फ एक चम्मच खिचड़ी खाई और लोगों का और बब्बन मित्र मंडल का अभिवादन करके घर की ओर चल दिए। ठकुराइन अभी भी वहीं थी और अपने भाई के तारीफ लोगों से सुनने के लिए सब लोगों से मिल रही थी और बात ही बात में राम लीला का ज़िक्र छेड़ देती थीं। इसी बीच  बबलू और ऋतु भी अपना मेकअप धो कर वहाँ पहुंचे। सब लोग वहाँ एक अभूतपूर्ण दशहरा के अंतिम पलों का पूरे ढंग से मजा लूट रहे थे।

“चलो अब हम लोग भी निकलते हैं”, सुधा की दीदी ने बब्बन की तरफ देख कर कहा।

“हाँ आप लोग निकलिये, लेट भी हो रहा है। सुधा हम लोग बुधवार को मिलते हैं”, बब्बन ने कहा।

“तुम लोग भी आओ बुधवार को मद्रासी डोसा वाले के यहाँ। आज तो ज्यादा बात नहीं हो पायी”, अन्नू ने अंजुम और शिखा की तरफ देखते हुए कहा।

“ठीक है”, शिखा ने हाँ कर दी।

“अंजुम तुमने कुछ नहीं कहा”, शेरू ने थोड़ा चिंतित होते हुए कहा।

“अरे इसको भी ले आएंगे”, शिखा ने हँसते हुए शेरू से कहा।

इसके बाद सब कोई एक-एक कर के निकल गए। बब्बन की मंडली भी आधी रात तक सारे काम को समेट कर अपने-अपने घर चली गई।

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सारे कार्यक्रम को ख़त्म करते-करते आधी रात हो चुकी थी। अन्नू अपने घर के बाहर बाइक खड़ी कर के घर में घुसा। मिश्राइन आँगन में बैठ कर सीता राम के नाम का जाप कर रही थी और मिश्रा जी अपनी लकड़ी वाली आराम कुर्सी में आंख बंद कर के बैठे थे।

अन्नू ने जैसे ही अपने जूते उतार कर दरवाज़े पर रखे, मिश्राइन ने तुरंत एक हल्की सी मुस्कराहट से अपना जाप बंद किया, “आ गया मेरा बच्चा, थक गया होगा। आओ मेरा बच्चा”। अन्नू की मम्मी के लाड प्यार के बीच में मिश्रा जी ने हलके से सी आँख खोल पूरे ममतामयी दृश्य का जायज़ा लिया और फिर आँख बंद कर ली।

“मेरे बच्चे ने आज पूरे क़स्बे में मेरा नाम रोशन कर दिया। शुक्लाइन बोल रही थी कि लड़का हो तो अन्नू के जैसा नहीं तो बिटिया ही अच्छी है”

अन्नू की माँ का बखान जारी था कि बीच में मिश्रा जी ने दोनों आँख खोलकर कुर्सी पे सीधा बैठ कर कहा, “सही-सही बताओ कि ये रावण का और पूरे मेले की लाइटिंग का प्लान तुम्हारा था? और तुमने ही इंजीनियरिंग दिखाई है अपनी?”

“हाँ पापा, भगवान् कसम सब मेरा ही ‘idea’ था”, भगवान् कसम खाते- खाते अन्नू ने बेहद सावधानी से अपना पैतरा चला। मन ही मन ये सोचा, “कसम तो प्लान के लिए खायी है अब इंजीनियरिंग मेरी थी कि किसी और की क्या फरक पड़ता है”

अन्नू ये सोच ही रहा था की मिश्रा जी ने दूसरा सवाल दागा, “प्लान तो ठीक है, इंजीनियरिंग किसने की?”

अन्नू कुछ बोलता कि बीच में ही बिजली जैसी आवाज़ की गर्जना हुई, “तुम मेरे लड़के से कभी खुश मत होना, आज पूरा क़स्बा मेरे लड़के का गुणगान कर रहा है, और तुमको उसके साथ ही आज CID बनना है। कोई मुज़रिम है क्या मेरा लड़का? देवर जी के लड़के पिंटू ने वो थर्माकोल वाले प्रोजेक्ट में एक पंखा क्या चला दिया था, तुम्हारे मुँह से उसकी तारीफ पाँच दिन तक नहीं गई थी। और यहाँ मेरे लड़के ने पूरा मेला जगमगा दिया, उसमे भी तुम्हारे सीने में जलन है?”, ये बात कर के मिश्राइन ने अन्नू को कसम के धर्मसंकट और उसके बाद के पितृ-संकट से बचा लिया।

“चलो बेटा, इनके मुँह से नहीं निकलेगी तुम्हारी तारीफ़। हाथ मुँह धो कर आराम करो। एक महीने से दिन रात मेहनत कर रहे हो। उनको नहीं दिख रहा तो क्या, मुझे तो कोई मोतियाबिंद नहीं हुई है। आज बीनू मामा का फ़ोन आया था, बोल रहे थे कि अन्नू ने खानदान का नाम रोशन कर दिया है। कल सुबह उनसे बात कर लेना”, पुत्र-मोह में पूरी तरफ से डूबी हुई मिश्राइन अन्नू को पूरे स्नेह के साथ अंदर ले गयी।

“चलो अच्छा है, अगर अन्नू ने वाकई ये सब किया है तो मेरी मेहनत सफल है”, मन ही मन मिश्रा जी ने अपनी आँख बंद करते हुए खुद को अपने सवालों का जवाब दिया।  वैसे देखा जाये तो बाप बच्चों से न जाने क्यों थोड़ा सा दूर रह जाता है, और खास कर के अपनी दिल की बात को समझाने के मामले में। अगर यही मन की बात  मिश्रा जी ने अन्नू को खुल कर बोली होती तो शायद उसको भी अच्छा लगता और मिश्राइन को तो शायद कहीं और ज्यादा अच्छा लगता।

खैर अब थोड़ा शेरू के घर के माहौल का जायज़ा लेते हैं। 

शेरू का घर वापस आने पर भरपूर सम्मान हुआ था। कुछ लोग तो सो गए थे, लेकिन अम्मी और खाला जगी थीं। मेले से लौटने के बाद बाक़ी लोग शेरू की तारीफ करते-करते ही सोए थे। अगल-बगल वाले भी शेरू की तारीफों पुल बाँध कर अभी-अभी उसके घर से निकले थे। शेरू की अम्मी ने शेरू की नज़र भी उतार दी थी। उनको लगता था कि बगल वाली सुल्ताना उनके शेरू से चिढ़ती थी और आज उसने शेरू की तारीफ भी बहुत ज्यादा कर दी थी तो नज़र लगने की संभावना बहुत ज्यादा थी।

“यार अंजुम इतनी गोरी हो गई है? हाथ एकदम जैसे दूध”, ये बात शेरू को अपने सामने मेज़ पर रखे दूध को देख कर याद आयी थी। शेरू भी अपनी उधेड़बुन में लगा हुआ था। उसने ये सोचा ही नहीं था कि अंजुम दोबारा मिलेगी और काश उसको पता होता कि अंजुम को पत्रकारिता में रुचि है तो वो भी थोड़ा पढाई में मन लगा लेता। इसी बहाने वो भी दिल्ली में साथ पढ़ता, साथ कहीं ट्रेनिंग करता। इसी सोच की रफ़्तार में वो यहाँ तक सोच लिया कि साथ पढाई नहीं कर पाया तो क्या, साथ ट्रेनिंग तो कर ही सकता है। कम से कम रोज़ मिलना तो हो जायेगा।

“लेकिन हमको कौन रखेगा काम पर? चपरासी भी नहीं बनाएगा! साला बन तो जाये हम चपरासी भी, लेकिन अंजुम के सामने क्या इज़्ज़त रह जाएगी मेरी”, खुद के सवाल और खुद के जबाब में ना जाने उसे कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला।

उधर सुधा से अचानक हुई मुलाक़ात से बब्बन का दबा हुआ प्यार ‘ममी’ के जैसे जाग गया था। बब्बन चाह कर भी नहीं सो पा रहा था। बार-बार सुधा की नज़रों के कुछ सवाल उसको परेशान कर रहे थे।

“बुधवार को उससे साफ़-साफ़ पूछ ही लेंगे कि हमसे शादी करनी हो तो बताओ। अगर घर वाले नहीं माने तो भाग के शादी कर लेंगे। अब जब भी शादी करेंगे, बच्चे पैदा करेंगे तो सिर्फ सुधा के साथ ही करेंगे। नहीं तो बन जाएँगे सन्यासी। चले जायेंगे गुप्ता जी की तरह हिमालय पर तपस्या करने”, इन्ही सब ख्यालों में डूबा बब्बन मच्छरदानी की चिलमन से छत पर धीमी गति से घूम रहे पंखे को देख रहा था। धूमते पंखे से सम्मोहित होकर बब्बन को भी आखिर नींद आ ही गई।

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