लफंगे

अनुराग – संजीव

अनुक्रमणिका

1. जब जब प्यार पे पहरा हुआ है……
2. एव्री नाईट इन माई ड्रीम्स…..
3. आज उनसे पहली मुलाकात होगी……
4. थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है…..
5. मेला दिलों का आता है…..
6. राजू बन गया जेंटलमैन……
7. हमसे क्या भूल हुई जो ये सजा हमका मिली…..
8. ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है……
9. तूने आँखों से कोई बात कही हो जैसे…….


जब जब प्यार पे पहरा हुआ है…..


दिल्ली की ओर जाते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग से बाएं की तरफ एक ‘बाईपास’ जाता था जो आगे चल कर लखनऊ हाईवे से जुड़ता था। करीब पाँच-सात किलोमीटर चलने के बाद, दायीं तरफ एक सिंगल लेन रोड चुन्नीगंज तक पहुंचती थी।  उत्तरी प्रान्त का ये क़स्बा, चुन्नीगंज, एक आम क़स्बे की तरह ही था। कुछ छोटे मोटे बदलाव के अलावा कई सालों से मानो यहाँ सब कुछ थमा सा ही था। रास्ते में वही हरे भरे खेत, वही पेड़ों की ठंडी छाँव, कुछ पुराने और कुछ नए घर लेकिन उन घरों की चारदीवारों पर डॉक्टर हाश्मी द्वारा गुप्त रोगों को सही करने की महारत वाले इश्तेहार हर साल बदलते रहते थे। 

साइकिल के टायर की रेस लगाते बच्चे, हर नुक्कड़ पर एक पान की टपरी और  हर गली के बाहर चाय की दुकान। उन चाय की दुकानों पर क्रिकेट और राजनीति पर चर्चा चुन्नीगंज को देश के बाक़ी  सभी कस्बों के जैसा बना देती थी। ऐसा नहीं था कि चुन्नीगंज में कुछ ख़ास नहीं था, चुन्नी गंज का बाजार आस पास के सभी कस्बों के बाज़ारों से बड़ा था। चुन्नीगंज का घंटाघर अंग्रेजों के ज़माने का था, चुन्नीगंज का दशहरा हर बार आस-पास के क़स्बों से अच्छा होता था और चुन्नी गंज का वाटर लेवल भी पूरे जिले में सबसे अच्छा था। कुछ पुरनिया जानकार इसका श्रेय बगल वाली नहर को देते थे, वो बात अलग है कि उस नहर में पानी पूरे साल में सिर्फ चार महीने ही रहता था। 

नहर से लग कर ही ‘बल्लू की दुकान’ थी। वैसे दुकान के मालिक का नाम बनवारी लाल चौरसिया था, बनवारी लाल ने अपने लड़के का नाम प्यार से बल्लू रखा था।  बल्लू ने अपने पिताजी का नाम रोशन करते हुए कुछ साल पहले नहर की बाढ़ में 4-5 लोगों को बचाया था और इसके कारण बल्लू को गणतंत्र दिवस में महामहिम राज्यपाल  से वीरता पुरूस्कार भी मिला था। वो तस्वीर आज भी उस दुकान पर सुसज्जित है।

बल्लू की दुकान की चाय वैसे तो चुन्नीगंज में ‘वर्ल्ड फेमस’ थी ही लेकिन इसकी ‘लोकेशन’ इसे और भी खास बनाती थी। घंटाघर चौक से दूसरी गली छोड़ कर एक छोटा सा रास्ता नहर की तरफ ले जाता था। बस वो सड़क जहाँ ख़तम होती थी और नहर के लिए कच्चा रास्ता शुरू होता था, वहीं बनवारी लाल ने ज़मीन को पूरे हक़ के साथ हथिया कर अपनी एक छोटी सी दुकान खोल ली थी। सामने काउंटर पर एक-दो कांच के कनस्तर जिसमें मीठे और नमकीन बिस्कुट, दीवार पर टंगे एक लकड़ी के तख़्ते पर कुछ पार्ले-जी के पैकेट और कुछ सिगरेट के पैकेट रखे रहते थे। वैसे वहाँ सिगरेट के कई ब्रांड के पैकेट दिखेंगे मगर भरी सिर्फ ‘गोल्ड फ्लैक’ और ‘चार मीनार’ ही होती थी। वैसे गलती बनवारी लाल की नहीं थी, दरसल वहाँ आने वाले लौंडो की औकात इससे ज्यादा की थी भी नही।

काउंटर के बगल में मिट्टी का ऊंचा चूल्हा था जिसका मुँह सामने की ओर खुलता था। उस चूल्हे पर पतीले में चाय खौलती रहती थी। पतीले को देख कर ये अंदाजा साफ़ लगाया जा सकता था कि जब से ये दुकान खुली है, तबसे उसने स्नान नहीं किया था। माना ये जाता था कि जिस दिन उस पतीले को अच्छे से धो दिया जायेगा, चाय का असली स्वाद उस दिन ही ख़त्म हो जायेगा। उसी चूल्हे पर कभी कभार समोसे और जलेबियाँ भी छन जाती थीं।

खैर, किसी को अगर एक सिगरेट जलानी हो या किसी दिलजले को अपने प्यार का ग़म अपने दोस्तों से बांटना हो, इन सभी कामों के लिए बल्लू की दुकान एकदम सही थी। दुकान के अंदर भले ही 3 मेज़ और 12 कुर्सियां आपस में चिपकी हुई रखी थीं, मगर फिर भी वहाँ दिल खोल कर बात करने में कोई संकोच नहीं करता था। आख़िर हमाम में सब नंगे ही होते हैं। दुकान का पिछला दरवाजा सीधा नहर की तरफ खुलता था। तो जिन लौंडों को समाज से छुप कर सिगरेट पीने की कला सीखनी होती, वो उधर चले जाते। और इन सबसे बड़ी बात ये कि वहाँ लौंडों का महीने का खाता चलता था और हिसाब-किताब में बल्लू कभी घपला नहीं करता था।

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सं 1998 में उत्तर प्रान्त में NCC के वार्षिक कैंप का आयोजन किया गया। वहाँ कक्षा 9वी से 12वी के सभी चुने हुए विद्यार्थी आने थे। बल्लू की दुकान पर दो लौंडे इसी विषय पर बकैती कर रहे थे।

“अबे शेरू तुमने NCC की वर्दी ली कि नहीं? हमने तो 3 जोड़ी सिलवा ली है स्टार टेलर के यहाँ से”, रंगबाज़ी का छोटा नमूना पेश करते हुए इक़बाल ने पूछा।

“NCC की वर्दी क्यों बे? अबे बल्लू, इस लौंडे  को चाय में गांजा मिला कर पिलाये हो क्या जो ये नशे में  बतिया रहा है?”, शेरू ने  इक़बाल पर ताना कसते हुए बल्लू से पूछा। अपने बाक़ी काम में व्यस्त बल्लू को स्कूल के लौंडों की बातों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी इसी लिए कुछ जवाब भी नहीं दिया।

शेरू उर्फ़  शेर अशफ़ाक़ खान, मूल रूप से एक पठानी था। 5 फ़ीट 9 इंच लम्बा, लम्बी नाक, दूध सा सफ़ेद रंग, हल्का शरीर,  थोड़ा झुका हुआ कंधा और स्टील वाले फ्रेम का नज़र वाला चश्मा शेरू के व्यक्तित्व की पहचान थी। मस्तमौला मिज़ाज़ और ज़िन्दगी को अपने ही शर्तों में जीने का अंदाज़, शेरू की बातों में साफ़ झलकता था। 

“अबे यार NCC कर लो, अगर C Certificate मिल गया तो फ़ौज की नौकरी में 5% की छूट मिलेगी। हमारी फूफी का लड़का NCC के चक्कर में ही तो फ़ौज में नौकरी पाया है”, इक़बाल ने रोज़गार की दृष्टि से शेरू को NCC का महत्व समझाने की कोशिश की।

“अबे नहीं यार, हमको गोला बारूद से डर लगता है और  3-4 साल से कंधे और क़मर में दर्द हो रहा है। इसी की वजह से हम नहीं जाना चाहते हैं फ़ौज में। यहीं मोहल्ले में रह कर भी देश की सेवा कर सकते हैं”, अपनी शारीरिक अक्षमता की दुहाई देते हुए शेरू ने कैंप में जाने से साफ़ मना कर दिया।

“हाँ बात भी सही है। फ़ौज में जाने के लिए शारीरिक रूप से तंदुरुस्त होना चाहिए। बचपन में सूखा बोर्नविटा फांकने की जगह दूध के साथ पिए होते तो हड्डियाँ मजबूत हो जाती अभी तक”, इक़बाल ने हथियार डालते – डालते बातों की सुई चुभा दी।

कुछ देर तक सिर्फ चाय की चुस्की की आवाज़ आती रही और कुछ देर बाद फिर इक़बाल ने कहा, “वैसे इस बार कैंप में माहौल बदला रहेगा। आर्य कन्या इंटर कालेज, सुभद्रा देवी इंटर कालेज और महिला सेवा सदन वाली लड़कियाँ भी आ रही हैं कैंप में”

ये बात कह कर मानो इक़बाल ने शेरू के अंदर एक अलग सी स्फूर्ति ला दी।

“चल बे कुछ भी, ऐसा कभी होता है क्या? ये चुन्नीगंज है, अमरीका नहीं जो लड़की और लड़का दोनो एक कैम्प में आएंगे”, शेरू ने इक़बाल की बात को तवज्जो नहीं दी और बिस्कुट खाने पर ध्यान केंद्रित किया।

“हाँ बे इस बार ऐसा ही है, और तुमने  पप्पू नाई की दुकान के बाहर वाला नारा नहीं पढ़ा क्या ‘लड़का लड़की एक समान’। उसी तरह से इस बार NCC का नारा भी यही है। टोपनदास वाले चौराहे के बगल में स्टार टेलर की दुकान के ऊपर  कितना बड़ा बोर्ड लगा है, देखे नहीं क्या तुम?”, इक़बाल ने दूसरे बिस्कुट का एक टुकड़ा मुँह में रखते हुए कहा।

“अबे भक्क, ऐसा नहीं हो सकता, खाओ अम्मी क़सम”, शेरू का इस बार पूरा ध्यान इक़बाल पर आ गया। 

“अम्मी क़सम भाई ऐसा ही है और अपने स्कूल में कैंप के लिए मारा-मारी है। और तो और स्टार टेलर वाले ने ही तो बहुत सारी लड़कियों की वर्दी सिली  है। हम जब नाप देने गए थे तब  बबिता, श्वेता, नरगिस सब अपनी वर्दी लेने आयी थी”, इतना सब बोलते-बोलते इक़बाल ने अपने गले की चोंच पकड़ कर रखी थी।

“ज़िंदगी अपनी शर्तों पे जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो जनाज़े ही निकलते हैं”, ये दो पंक्ति बोलने के बाद मानो कि जैसे शेरू के शरीर मे दशकों से चले आ रहे तमाम तरह के शारीरिक दर्द और कष्टों को मुक्ति मिल गयी हो।

“अबे इक़बाल तुमको पता है भगत सिंह 13 साल की उमर में देश के लिए फाँसी चढ़ गए थे और हम तुम क्या कर रहे हैं 18 की उमर में? सिर्फ़ बकैती और कुछ नहीं”, शेरू ने गंभीर हो कर कहा।

“पक्का! 13 के तो नहीं थे भगत सिंह, 21-22 के रहे होंगे शायद!”, इक़बाल ने संदेह व्यक्त करते हुए अपने इतिहास के ज्ञान का प्रदर्शन कर दिया। 

“हाँ तुम बन जाओ वकील और करो फ़ालतू की बहस, बात ना समझना कि हम बोल क्या रहे हैं, बस चौधरी-पन पेलना”, शेरू ने झल्लाते हुए इक़बाल को झेप दिया। “साला बात समझो, बात की ताक़त को समझो, लेकिन नहीं, बस लग गए अपना ज्ञान पेलने।  हमारे बोलने का मतलब था कि हम लोग क्या कर रहे हैं उनके बलिदान के लिए? कुछ नहीं”, शेरू ने समझाते हुए कहा।

“हाँ भाई ये बात तो है, अब?”, इक़बाल ने पूछा।

“अब क्या, फ़ौज में देश की सेवा करेंगे। यहाँ रह कर क्या घुइयां उखाड़ते रखेंगे। ऐसे चाय की दुकान  में बकैती करके देश की सेवा नहीं होती, उसके लिए सरहद में जाना होता है, और वहाँ जाने का दरवाजा NCC कैंप से ही खुलता है। इतनी बात तुम्हे समझ में नहीं आती है? करो बाइक स्टार्ट और सीधे कॉलेज चलो”, शेरू ने काला चश्मा लगाते हुए इक़बाल को आर्मी कमांडर जैसे आदेश दिया।

इक़बाल ने भी नए रंगरूट जैसे आदेश का पलान करते हुए तुरंत गाड़ी स्टार्ट की और मन ही मन जय हिंद का घोष लगा दिया।

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“अंजुम भी जा रही होगी पक्का इस बार।  क़सम से इस बार तो निकाह का वादा कर के गाल में एक चुम्मा तो दे ही देंगे पक्का, नहीं मतलब हाथ में चुम्मा दे कर इज़हार-ए-मुहब्बत कर ही देंगे। गाल पर लेने से मना कर दे शायद। आख़िर शरीफ घर से है और ये चुन्नीगंज है कोई बॉम्बे थोड़े ही है”, शेरू ने बाइक के पीछे बैठे-बैठे खुद से कई सवाल किये। इसी उधेड़बुन में अंजुम से चुम्मी और निकाह के बीच की दूरी का अंदाज़ा लगाते हुए गाड़ी जनता इंटर कालेज पहुँच गयी।

वहाँ खड़े गार्ड को जय रामी करते हुए शेरू तुरंत NCC कैंप के प्रबंधक श्याम मोहन केसरवानी के पास पहुँचा।

“प्रणाम गुरु जी, आप कैसे हैं”, ये कहते हुए शेरू ने लपक कर केसरवानी सर के पैर को छूकर अभिवादन किया।

“ठीक हूँ बेटा तुम बताओ, आज कॉलेज की याद कैसे आ गयी, वो भी कॉलेज बंद होने के बाद?”

“कुछ नहीं गुरु जी, देश की सेवा का मन बन गया है। बस आप आशीर्वाद दीजिये और NCC कैम्प के लिए मेरा भी नाम लिख दीजिए”, चापलूसी में डूबा हर एक शब्द शेरू ने हाथ जोड़ कर केसरवानी सर के सामने परोस दिया।

“अरे तुमने देर कर दी बेटा, बस अभी-अभी लिस्ट फ़ाइनल कर के प्रधानाचार्य जी का हस्ताक्षर ले कर आये हैं। अब अगले साल चले जाना तुम”, केसरवानी जी ने एक लिस्ट को फाइल में रखते हुए कहा ।

“अरे नहीं गुरु जी इसी साल जाना है हमको”, शेरू ने दृढ़ता से कहा।

“बेटा तुम कोई DM तो हो नहीं कि तुमने कहा और हमने लिस्ट फाड़ के नयी बना दी।  चलो अच्छा हटो हमको कंट्रोल वाले के पास जाना है, साला चार महीने से राशन कार्ड नहीं बना रहा है। आज तो आर या पार होगा”, केसरवानी सर शेरू को हाथ से हटाते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ गए।

राशन कार्ड का नाम सुनकर शेरू की जैसे बाँछें खिल गयी। “अरे गुरु जी, क्या हुआ राशन कार्ड में?”, शेरू ने उत्सुकता से पूछा।

“तुम राशन मंत्री हो क्या, जो तुमको समस्या बताएं, ज्यादा तेल पानी ना लगाओ, हम लिस्ट नहीं बदलने वाले”

“अरे सर लिस्ट वाली बात बाद में, आप अपना और जिसका जिसका नाम चढ़वाना हो कार्ड में बताओ। एक घंटे में आपको कार्ड लाकर देते हैं। और कहिए तो ‘ग़रीबी रेखा’ के नीचे वाला सफ़ेद कार्ड बनवा दें, उसमें चावल और चीनी ज़्यादा मिलती है”, शेरू ने केसरवानी जी को रोकते हुए कहा।

“क्या जुगाड़ है तुम्हारा? साला हम चार महीने से दौड़ रहे हैं, और तुम एक घंटे मे बनवा दोगे”, केसरवानी जी ने शेरू को संदेह की निगाह से देखते हुए कहा। वैसे कई सालों से ठोकर खाने वाले के लिए ऐसी बातों में कहीं न कहीं उम्मीद की किरण जरूर दिखती है। वो हर उस तिनके की तलाश में रहता है जिससे उसकी नैय्या पार हो जाये।

“अरे गुरु जी, आप बस आम खाओ आम, गुठली हमको दे दो। अरे मतलब नाम हमको दे दो, एक घंटे मे आपको कार्ड ला कर देते हैं। और अगर कार्ड दे दिया तो लिस्ट मे नाम डालना पड़ेगा”, शेरू ने अब अपनी शर्त रखी।

“अरे तुमको डिप्टी कमांडर बना देंगे, श्याम नारायण दुबे जी से बोल कर”, केसरवानी जी ने ये कह कर सारी शर्तों पर जुबानी हस्ताक्षर कर दिए ।

यहाँ ये समझना ज़रूरी है कि श्याम नारायण दुबे, उस क्षेत्र के NCC ट्रेनिंग के प्रमुख हैं और उनका ही सुझाव था कि इस बार लड़कों और लड़कियों का कैंप एक साथ होना चाहिए।

“डिप्टी कमाण्डर, और हम? अरे यार अंजुम भी तो डिप्टी कमांडर है”, ये सोच कर मानो शेरू को भरोसा ही नहीं हो रहा था।

“इक़बाल बाईक लाओ बे, तुम घर चलो हम रात तक बाइक ला के देते हैं तुमको”, अंजुम के साथ वक़्त गुजारने का ये सुनहरा अवसर शेरू कतई अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था।

वैसे बता दें, शेरू के इस आत्मविश्वास के पीछे का राज़ उसके परम मित्र के भैया थें जो कलेक्टर ऑफिस में बड़े पद पर थें। उनसे ये काम करवाना कोई बड़ी बात नहीं थी। जैसा उसने कहा था, ठीक एक  घंटे और छप्पन मिनट के बाद शेरू ने गुरु जी का राशन कार्ड हाथ मे देते हुए कहा, “गुरु जी याद रखना डिप्टी कमांडर से नीचे की रैंक नहीं चाहिए”।

केसरवानी जी की आँखों से ख़ुशी के आंसू टपकने ही वाले थे, लेकिन खुद को सँभालते हुए कहा, “अरे बिल्कुल बेटा, तनिक भी चिंता न करो अब। लेकिन कैसे किया तुमने ये सब?”

“गुरु जी बोला ना आपको कि आप बस आम खाओ आम”, ये बोलते हुए शेरू ने अपनी बाइक सीधे स्टार टेलर की दुकान पर रोकी।

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“क्या पुन्नू भैया, सुना है कि आज कल फिर से बेलबाटम सिल रहे हो, बैगी के ज़माने में?”, शेरू ने काले चश्मे को शर्ट की पॉकेट में रखते हुए कहा।

“अरे कहाँ शेरू, वो तो प्रधानाचार्य जी का लड़का अन्नू आया था, NCC वाली वर्दी के लिए, चार जोड़ी सिलवा के ले गया है, दो पतलून तो रेगुलर है, एक बैगी और कहा एक बेलबटम चाहिए। हमें आप जैसे ग्राहक जो बोलें, जैसा बोलें हम सिल देते हैं”, पुन्नू ने ये बोलते-बोलते सामने पड़े एक कपड़े के टुकड़े को एक झटके में काट कर अपनी कार्य कुशलता का भी प्रमाण दे दिया।

“अच्छा अच्छा वही लड़का जो हीरो बन कर घूमता है”, शेरू ने दुकान पर टंगे सारे कपड़ों पर एक बार हाथ फेरते हुए बोला। 

“हाँ हाँ वही। वैसे उसके बदन पर NCC की वर्दी बहुत जंच रही थी, ऊपर से मेरे हाथ की फिटिंग का कसबे में कोई जबाब नहीं”, पुन्नू ने इस बार अपनी ज़ुबानी ‘मार्केटिंग’ करने में थोड़ी भी देर नहीं लगाई।

“छोड़ो उस लौंडे को, और फटाफट हमको भी NCC वाली वर्दी कल रात तक सिल कर दे दो। और हाँ, मेरी वर्दी उस लौंडे से इक्कीस ही होनी चाहिए, उन्नीस नहीं, मान लो अपनी बारात के कपड़े सिलवा रहे हैं तुमसे”, शेरू ने सामने लगे शीशे में खुद को निहारते हुए कहा।

“अरे शेरू भाई, पगला गए हो का? नहीं भई एक हफ़्ता तो कैसे भी लगेगा और तुम कल की बात कर रहे हो। ये तो नामुमकिन है, नहीं हो पाएगा कल तक”, पुन्नू ने अपनी कैंची को थोड़ा विराम देते हुए असमर्थता जताई।

“क्या बोल दिए पुन्नू भाई? यही सुनने के लिए बॉम्बे टेलर, नवयुग टेलर, और तो और रेयमंड वाले जेंटलमैन टेलर को छोड़ कर आपके पास आये हैं? हमको पता था ये नामुमकिन है उनसे नहीं हो पाएगा। इसीलिए आपके पास आए हैं न”, शेरू ने पुन्नू को थोड़ा चने के झाड़ पर चढ़ाने की कोशिश की।

“अरे शेरू भाई, उन लोगों को इतनी वैरायटी सिलनी कहाँ आती? बॉम्बे नाम रखने से कोई थोड़े ही शाहरुख़ खान का कपड़ा सिलने लगता है? नवयुग तो नाम का नवयुग है, अभी तक बेलबॉटम के आगे सीखा नहीं और ये जेंटलमैन टेलर का रफ़ीक, रेयमंड के कारखाने में कोई कपड़ा नहीं सिलता था, वहाँ के कैंटीन में लोगों को पानी परोसता था”, अपने गर्दन पर रखे नाप लेने वाले टेप को ओलिंपिक के मैडल की तरह ठीक करते हुए, पुन्नू ने अपने प्रतिद्वंदियों की धज्जियाँ उड़ा दी।

“मतलब कि कल रात को हम वर्दी लेने आ रहे हैं”, शेरू ने उत्साहित होकर पूछा।

“नहीं शेरू भाई, बहुत कठिन है कल तक चार कपड़े सिल कर देना”, पुन्नू भाई ने उदास हो कर कहा।

“अच्छा अब यही करोगे भैया, ठीक है डबल सिलाई ले लेना। अब तो कर दो”, इमोशनल कार्ड के विफल होने के बाद शेरू ने पैसे से माहौल बनाया। 

“अरे नहीं भई, नहीं हो पायेगा”, इस बार पुन्नू ने दृढ़ता से अपनी बात रखी और फिर से कपड़े के टुकड़े में अपनी कला दिखाने लगा। लेकिन इस बार मानो शेरू का गुस्सा कपड़े पर ही निकाल रहा हो।

“अच्छा 2 रेगुलर वाला ही सिल दो, डबल सिलाई ले कर, अब तो कर दो। कपड़ा भी तुम अपने रेट का ले आना। अब तो सब तुम्हारे मन का कर दिया, अब तो कर दो भाई। मेरे जीवन-मरण की बात है ये”, शेरू ने मानो अपने सारे दांव एक साथ चल दिया।

“ठीक है, हो जाएगा लेकिन पूरा पैसा एडवांस देना होगा”, पुन्नू ने एक और शर्त रख दी।

शेरू ने तुरंत अपनी अंगुली से सोने की अंगूठी उतारी और देते हुए बोला, “कल रात को पैसे दे कर वर्दी और अंगूठी दोनो ले जाएंगे”

वर्दी के लिए शेरू की शिद्दत देख कर पून्नू टेलर ने बेस्ट ‘फिट्टिंग’ का वादा करते हुए बिजली की रफ़्तार से शेरू की नाप ले ली।

दुकान से निकल कर शेरू ने  सीधा इक़बाल को उसकी बाइक थमाई और घर जाकर अपने कमरे में सो गया। घर वाले भी सोच रहे थे कि कहीं तबियत तो ख़राब नहीं है उनके साहबजादे की। मगर ये बात तो सिर्फ शेरु को ही पता थी कि उसे इश्क़ का बुखार धीरे-धीरे चढ़ने लगा था।

“यार बस अंजुम से दोस्ती हो जाए साला पूरा ज़िंदगी NCC का कैंप करेंगे, चुम्मा ना मिले तो कोई बात नहीं, बस हाथ ही पकड़ लें बहुत है। निकाह के तुरंत बाद अजमेर जा कर चादर चढ़ाएँगे”, माथे पर  हाथ रख कर सीलिंग फ़ैन की घूमती हुई कटोरी देखते हुए शेरू अगले पाँच दिन से लेकर अगले पाँच साल के बारे में योजनाएं बनाते बनाते सो गया।

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आखिरकार वो दिन आ ही गया जब पूरे जिले के नवयुवक और नवयुवतियाँ तीन दिवसीय कैम्प के लिए आर्मी के 508 कोर की परेड मैदान में इकट्ठे हुए।

क्या ही नज़ारा था! लड़कों और लड़कियों के कैम्प के बीच में सिर्फ़ कुछ बांस के खम्बों में टिकी एक पतले नरियल की रस्सी की दीवार थी। उस बेजान रस्सी के नीचे दो सुलगते अरमानों के बीच सफ़ेद चूने से सरहद खींची गयी थी, जिसकी रेकी वहाँ मौजूद हर लड़का कर रहा था। कुछ लौंडे मन ही मन सोच रहे थे कि इस दीवार को तो आराम से फाँद जाएँगे। कुछ लड़के इस लक्ष्मण रेखा को लांघने के लिए रावण से प्रेरणा लेने की सोच रहे थे। इनमे कुछ स्वघोषित लक्ष्मण भी थे जो इस लक्ष्मण रेखा की निगरानी कर रहे थे। वो इस ताक में थे कि कोई रावण  रेखा को लांघते दिखे और उनकी शिकायत दुबे सर से कर के कुछ नंबर बटोर लें। 

वहाँ आए हुए सब के सब स्कूल या तो ख़ालिस लड़के या फिर ख़ालिस लड़कियों के ही थे। इसीलिए उत्सुकता दोनो तरफ़ की फ़ौजों मे बराबर थी लेकिन सरहद के साथ ही इंडिया और पाकिस्तान की तरह दोनो तरफ़ के गुरु जी और गुरु माताएं बिल्कुल बोर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स और पाकिस्तान रेंजर्स की तरह तैनात थीं। इतने सख्त  इंतज़ाम के बावजूद, दोनो तरफ़ के घुसपैठिये, घुसपैठ की ताक मे अभी से लग गए थे ।

“अबे यार अंजुम नहीं दिख रही”, शेरू ने इक़बाल से चिंता व्यक्त करते हुए पूरे मैदान को चार से पाँच बार निहारा।

तभी अचानक से घोषणा हुयी कि सारे डिप्टी कमांडर ऊपर बने मंच पर आ जाएँ और एक दूसरे का अभिवादन करें। 15 नामों मे शेरू को बस अपना और अंजुम का नाम ही सुनाई पड़ा। झटके से सभी डिप्टी कमांडर मंच पर थे और भाग्यवश शेरू और अंजुम अगल बग़ल ही खड़े थे।

अंजुम बानो, जैसा नाम वैसी अदा, मानों किसी  शायर की सबसे पसंदीदा नज़्म हो। आखों और होंठों  से शायरी ही टपकती थी जिसे सिर्फ और सिर्फ एक सच्चा शायर ही पढ़ सकता था।  गाल पर काला तिल, मानो बनाने वाले ने पहले से नज़र उतार कर रखी हो। बड़ी बड़ी भूरी आँखें और उसपर हल्के हाथों से लगाया काजल किसी को भी मोहित कर सकता था। लम्बे लम्बे काले बाल उसकी खूबसूरती में और भी चार चाँद लगाते थे। आवाज़ में मिठास और नज़ाकत का मेल ऐसा था कि कोई एक बार सुन ले तो ता-उम्र भूल न सके।

अंजुम पूरे मोहल्ले मे ही नहीं, बल्कि पूरे क़स्बे में मशहूर थी। और हो भी क्यूँ ना, दिल्ली वाली फ़ैशन के कपड़े सबसे पहले अंजुम के पास ही आते थे। बगल वाले असलम भाई इनके मामू लगते थे और पूरे कसबे में नए फैशन की पहली खेप असलम मियाँ के पास आती थी। बता दें, इन दिनो भी अंजुम का पटियाला वाला सूट ख़ूब चर्चे मे था।

इधर अंजुम को अपने बगल में खड़ा देख शेरू को अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था। 

“Hi Anjum, I am Sher Ashfaaq Khan, fine Thank You”, शेरू ने अपनी पूरी अंग्रेज़ी, जो हथेली पर लिख कर लाया था, तिरछी नज़रों से पढ़ते हुए एक सांस में बोला दिया।

“I am good Sheru. इतना भारी भरकम नाम बताने की जरूरत नहीं थी”, अंजुम ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया।

“अंजुम हमको जानती है, मेरा नाम भी उसे पता है”, ये सोचकर शेरू को ऐसा लगा मानो उसे NCC का certificate तुरंत मिल गया। “हाँ लेकिन तुमको कैसे पता मेरा नाम?”, शेरू ने घोर आश्चर्य से पूछा।

“अरे तुमको ही रुखसाना आपा के निकाह मे करेंट लगा था ना, फरर्राटे वाले पंखे से”, अंजुम ने मैदान की तरफ देखते हुए, धीमी आवाज़ में शेरू से पूछा। 

“हाँ वो नंगे तार पे हाथ रख दिए थे हम”, शेरू ने धीरे से जवाब दिया।

“उसके बाद तुम जिस तरह चिल्ला चिल्ला के रो रहे थे, वहाँ मौजूद हर कोई तुम्हे पहचान गया था”, अंजुम अपनी हंसी को दबाते हुए बोली।

“अरे बहुत तेज़ करंट लगा था यार, पूरा हाथ झनझना गया था”, शेरू ने धीरे से कहा फिर बात को बदलते हुए पूछा, “वैसे तुम भी थी क्या उस निकाह में?”

“हाँ opaque blue झालर वाले सलवार में हम ही थे, बहुत हँसी आयी थी हमको”, इस बार अंजुम हंसी रोक नहीं पायी।

“नालायकों, अभिवादन के लिए बुलाया था, रिश्तेदारी के लिए नहीं”, मुख्य संयोजक श्याम नारायण दुबे की कर्कश डाँट ने इन दोनों की यादों के सफर को बीच में ही रोक दिया।

ये कहानी अधूरी रह जाएगी अगर हम मुख्य संयोजक श्री श्याम नारायण दुबे जी के मिज़ाज़ पर थोड़ी रोशनी न डालें। प्यार से लौंडे इनको संदू (श्याम नारायण दुबे का ‘शार्ट फॉर्म’) बुलाते थे।  उन्हें इंदिरा गाँधी जी के प्रति अपार सम्मान था और उनके नाम पर बेहद भावुक हो जाते थे संदु साहब। NCC की बात छोड़ दें तो संदु हमेशा धोती कुर्ता पहनते थे और लगभग हर क्लास खत्म होते-होते  इंदिरा गांधी की हत्या की बात करते-करते रोने लगते थे। रोते-रोते अपनी धोती से आंसुओं को पोछते और भारत के उज्जवल भविष्य की कामना करते थे। जितना इंदिरा गाँधी से स्नेह था उससे कहीं ज्यादा बढ़ती हुई जनसँख्या से नफरत, हर समस्या को बढ़ती हुई जनसख्या से जोड़ना उनका परम कर्त्तव्य था। वैसे देखा जाये तो बढ़ती जनसँख्या ही तो हर समस्या की जड़ है।

“विपरीत लिंग का प्राणी देखा नहीं कि लगे लबर-लबर करने। हटो यहाँ से”, संदु ने हड़काते हुए अंजुम और शेरू को अलग कर दिया। शेरू को संदु के रूप में एक ऐसा ‘विलेन’ दिखा जो शायद दो जवान दिलों को एक नहीं होने देना चाहता। शेरू ने मन ही मन में संदु की माँ, बहन, मौसी,  फूफी जी को याद करते हुए कुछ अपशब्द बोलने शुरू ही किये थे कि अचानक संदु की कर्कश आवाज़ एक बार फिर गूंजी, “ऐ लड़के तुम्हारा डिप्टी कमांडर वाला बिल्ला कहाँ है?”

खैर चलिए वापस मैदान पर आते हैं।

“कौन सा बिल्ला सर?”, शेरू ने अनभिज्ञता जताते हुए कहा।

“अच्छा तो बिल्ला नहीं है तुम्हारे पास और तुम्हे पता भी नहीं की बिल्ला की जरूरत होती है यहाँ पर? तुम्हारे जैसे अज्ञानी को डिप्टी कमांडर किसने बनाया? हम नहीं मानते तुम्हे डिप्टी कमांडर, जाओ और लाइन में खड़े हो जाओ”, संदु की आवाज इतनी तेज़ थी कि मैदान के आखिर में खड़े कैडेट को भी नींद से जगा दिया।

ये शब्द शेरू को बिलकुल वैसे ही लगे जैसे बारात में लड़के के जीजा को गाड़ी में सबसे पीछे बैठने को बोल दिया जाये, अर्थात घोर बेज्जती। अंजुम ने शेरू की तरफ भौ सिकोड़ कर देखा और ऐसा लगा कि कह रही हो – “कैसे काफ़िर हो तुम, क़यामत के दिन अल्लाह को क्या मुँह दिखाओगे?”

शेरू का दिल टूटता ही जा रहा था कि अचानक श्याम मोहन केसरवानी की मोहक आवाज़ गूंजी, “अरे सर, शेरू का बिल्ला मेरे पास रह गया था”

टूटती उमीदों में ये शब्द शेरू को जैसे नया जीवन दे गए। उसका झुकता कंधा अचानक फिर से सतर हो गया और एक विजेता की भांति शेरू ने अंजुम की तरफ अपनी भौंह मटकाते हुए ‘डायलॉग’ मारा, “हमारा बिल्ला हमारे मास्टर साहब लेकर आते हैं, ये सब छोटे काम वही करते हैं”।

“अरे केसरवानी जी आप अपने छात्रों को कम से कम ‘प्रोटोकॉल’ का पूरा ज्ञान तो दिया कीजिये। बताइये बिल्ला ही भूल गए आप। अगर आप हमारे नामराशी न होते तो ये लड़का आज कैंप के बाहर ही मिलता आपको”, ये बोलते हुए संदु ने एक सस्ता सा एहसान केसरवानी जी के कंधे पर लाद दिया। राशन कार्ड के अलावा केसरवानी जी की आकांक्षा थी कि वो अगले तीन-चार साल में संदु के पद पर आसीन हो जाएं, बस  इसी लिए उन्होंने भी हाथ जोड़ कर अपनी गलती को स्वीकार किया। उस वक्त शेरू का मन किया कि पूरे जिले के हिस्से के राशन से गुरु जी को नहला दें।

“आज हमको बहुत ख़ुशी है कि मेरे सालों के अथक प्रयास के बाद, इस जिले के छात्र और छात्राएं एक साथ NCC के कैम्प में ट्रेनिंग करेंगे। आज अगर इंदिरा गाँधी जी होतीं तो कितना गर्व होता उनको, कितनी खुश होतीं वो ये देख कर कि लड़कियां आज लड़कों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चल रही हैं”, आदतन संदु ने  फिर अपने भाषण को  इंदिरा गाँधी जी को समर्पित करते हुए शुरू किया। 

“अरे यार कंधे से कन्धा मिलाने ही तो आये हैं हम लोग”, वहाँ उपस्थित 99% कैडेट्स ने मन ही मन संदु की हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी मुंडी हिला के सहमति जताई।

“कितना ऋणी है ये देश उनका, उनके प्रयासों से पूरा विश्व प्रभावित था लेकिन एक दिन मार दिया उनको कुछ देश के दुश्मनों ने। ‘ठांय-ठांय’ कर के भून दिया”, ये सोचते हुए संदु ने अपनी धोती से अपने आंसुओं को पोछने का असफल प्रयास किया, क्यों कि आज  उन्होंने पतलून पहनी थी। वास्तविकता से रूबरू होते ही संदु ने रूमाल से आंसू पोछे और जिंदादिल कमांडर जैसे पुनः अपने आपको सम्हालते हुए भाषण देना चालू रखा।

“बस आप सब लोग अपने यौवन के आवेश में आकर कोई ऐसी गलती न करें जिससे मुझे और अन्य गुरु एवं गुरु माताओं को अपने निर्णय पर खेद हो”, ऐसा बोलते हुए संदु ने आर्य कन्या इंटर कॉलेज की NCC की टीचर मल्होत्रा मैडम की तरफ सावधानी से देखा।

“ये देखो, बुड्ढा लाइन झेले पड़ा है मैडम की तरफ और हमको गीता के प्रवचन सुना रहा है”, लम्बे भाषण से असंतुष्ट एक कैडेट ने बगल वाले लौंडे से कटाक्ष करते हुए बोला।

“तभी हम लोगों ने सोच समझ कर निर्णय किया है कि कैंप में छात्र, हर एक छात्रा को बहन करके सम्बोधित करेगा”, संदु ने कुटिल मुस्कान छोड़ते हुए सभी की तरफ देखा।

जिस तरह किसी मधुमक्खी के छत्ते पर एक बड़ा सा पत्थर मारने पर पूरे वातावरण में ‘भिन्न भिन्न’ करके आवाज़ आने लगती है ठीक उसी प्रकार पूरे मैदान पर असंतुष्टि की ‘भिन्न भिन्न’ की आवाज़ आने लगी थी।

“शांत एकदम शांत, जिसको-जिसको इस बात से समस्या हो वो तुरंत कैंप छोड़कर जा सकता है”, संदु ने ये बोलकर अपना ढृढ़ संकल्प स्पष्ट कर दिया।

मन ही मन में साफ़ इंकार करते हुए सभी ने चुप रहकर संदु के हिटलर शाही फरमान का समर्थन कर दिया।

“सबको एक उदाहरण भी दे के समझा रहा हूँ, ऐ बिल्ला भूलने वाले लड़के और ऐ लड़की तुम दोनों इधर आओ”, संदु ने शेरू और अंजुम से 15 मिनट पहले की खुन्नस निकालने के मौके का पूरा फायदा उठाते हुए दोनों को बुलाया।

“हम क्यों?”, लड़खड़ाती आवाज़ में शेरू ने खुद को बचाने का असफल प्रयास किया।

“अरे आओ तो, प्रधानमंत्री बनाना है तुमको, बड़ा आया ‘हम क्यों’ पूछने वाला”, संदु ने शेरू का सवाल दोहराते हुए गुस्से में कहा, “आओ जल्दी”

इधर अंजुम पहले ही संदु के बगल में जा के खड़ी हो गई थी। दिल में गोवर्धन जितना बड़ा पहाड़ लिए, शेरू आगे बढ़ा। एक-एक कदम मानो कोस भर का हो। 

“अरे यार ये बुड्ढा बहुत कमीना है, साला पीछे ही पड़ गया है हमारे”, शेरू बड़बड़ाते हुए मंच के करीब पहुँच गया। संदु ने हाथ पकड़ कर शेरू के आखिरी चार कदम जल्दी ख़त्म करवा दिए ।

“बच्चों अब मैं तुम सबको बताऊंगा कि कैसे एक दूसरे को बुलाना है”, शेरू की ज़लालत का प्रदर्शन करते हुए संदु बोला।

“क्या नाम है तुम्हारा फिर से बताओ ज़रा?”, संदु ने पूछा।

“अंजुम बानो”, अंजुम ने तपाक से जवाब दिया।

“ऐ लड़के, तुमको इस बालिका को बुलाना होगा तो कैसे बुलाओगे?”, संदु ने शेरू की तरफ मुंह करके पूछा । 

“Hello dear Anjum! How are you, I am fine, Thank you”, शेरू ने अंजुम की आँखों में आँखें डाल कर प्यार से कहा।

“I am good Sheru ji”, ये वाक्य अंजुम पूरा करती कि इससे पहले आवाज़ आयी

“जूता मारते मारते तुमको ‘डिअर’ से ‘बियर’ बना देंगे, बेहूदा बदतमीज़, आवारा”, एक सांस में संदु ने शेरू को जम के गरियाते हुए श्याम नारायण केसरवानी की तरफ उनकी पढ़ाई में खोट निकालने की दृष्टि से देखा। संदु फिर बोला, “बोलते जा रहे हैं कि लड़का लड़की को बहन बोलेगा, लेकिन इनको ‘डिअर’ याद आ रहा है, हद्द होती है बदतमीज़ी की”

“हमको विनोद सर ने सिखाया है कि अगर किसी को इज़्ज़त से बोलना हो तो ‘डिअर’ ज़रूर लगाना।  हम तो अपने घर में सभी को ऐसे ही बोलते हैं, ‘डिअर’ अब्बा, ‘डियर’ अम्मी, ‘डियर’ खालू , और ‘डिअर’ आपा’”, शेरू बहुत ही मासूमियत से अपनी सफाई  पेश कर रहा था।

“हाँ हमको भी ऐसे ही सिखाया गया है”, भीड़ के बीच में अन्नू ने शेरू की बात का पुरजोर समर्थन किया। अन्नू वही नवयुवक है जिसने स्टार टेलर के यहाँ से 4 जोड़ी ड्रेस सिलवाई थी।

अन्नू मिश्रा, करीब साढ़े पाँच फिट लम्बाई, साफ़ गेहुंआ रंग, छरहरा शरीर और एकदम सीधे रेशमी बाल जो हवा के झोंकों के साथ अन्नू के सर पर अपना स्थान बदलते रहते थे। वैसे अन्नू को बीच-बीच  में अपनी उँगलियों से बाल सँवारने की आदत थी। हल्की-हल्की मुलायम मूंछें, दाढ़ी और चेहरे पर कुछ मुंहांसे, उसके जवानी में प्रवेश होने का प्रमाण देती थी। सौम्य व्यवहार और दूसरों को प्रति सम्मान अन्नू की पहचान थी। इसी कारण से पूरे मोहल्ले की आखों का तारा और अपनी माँ का राज दुलारा था। अन्नू पढाई में बेहतर होने के साथ साथ फैशन का भी अच्छा ज्ञान रखता था।  नए फैशन वाली टी शर्ट, जीन्स, कभी-कभार काला चश्मा, रंगीन जूते और उस पर कक्षा 10 में ही मामा के द्वारा दिलाई गई  ‘हीरो पुक’ की वजह से पूरे क़स्बे में उसका एक अलग ही रौला था।

ऐसे भी लौंडों की फितरत होती है कि भीड़ में खड़े होकर कुछ न कुछ टिपण्णी करना। मगर ये किसी को नहीं पता था कि ये एक टिपण्णी शेरू और अन्नू के बीच दांत काटी दोस्ती का बीज बोयेगी । खैर, भीड़ में छुप कर अन्नू टिपण्णी करना चाह रहा था, मगर संदु की चील सी आँखों से वो बच नहीं पाया।

“तुम कौन हो? और काहे चौधरी बन रहे हो?”, संदु ने झल्लाते हुए अन्नू से पूछा । 

“जनता इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल श्री राज कुमार मिश्रा के लड़के है”, अन्नू ने गर्व भरी आवाज़ में थोड़ा तेज़ बोला जिससे मैदान में ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुनाई दे।

क्यूंकि पूरे जिले के शिक्षा विभाग में मिश्रा जी की हनक थी तो संदु ने अन्नू को पेलने का विचार तुरंत त्यागते हुए कहा, “अच्छा अच्छा”, और फिर से शेरू की तरफ रुख किया और कहा, “वो सब नहीं पता, लेकिन तुम इस लड़की को बहन अंजुम कह के ही बोलोगे”।

शेरू का मन वहाँ से पोलो काटने का अर्थात भागने का हुआ लेकिन ऐसा बिलकुल संभव नहीं था। तो शेरू ने चुप रहना ही उचित समझा।

पूरी गणित लगाते हुए शेरू ने जब अपने आप को हारा हुआ माना तो मायूस हो कर ‘अंजुम बहन तुम कैसी हो’ जैसे कानो में ज़हर घोलने वाले शब्द बोल ही दिया।

“हाँ ये हुई ना बात”, बोलते हुए संदु ने तालियां बाजवा दी।

“मैं ठीक हूँ भाई शेरू”, बोलकर अंजुम ने मानो कानो में ऐसा भाला ठूंसा जो एक कान से घुस के दूसरे कान से निकल गया हो।

‘दिल की दुनिया लुटी दम ये बेदम हुआ’, इसी प्रकार की कुछ पंक्तियों को बुदबुदाते हुए शेरू ने मन ही मन डिप्टी कमांडर पद से इस्तीफा देते हुए मंच से नीचे का रुख किया। नीचे आकर शेरू अन्नू के बगल में खाली जगह पर आकर खड़ा हो गया।

“अरे भाई, तुम काहे दुखी हो रहे हो? तुमको तो कोई लोड नहीं लेना चाहिए”, बगल में खड़े अन्नू ने शेरू को सांत्वना दी।

“अरे यार तुम पर बीतेगी तो पता चलेगा”, ऐसा बोलते हुए शेरू ने अन्नू के पाँच मिनट पहले किए हुए एहसान पर थूकते हुए उधर मुँह कर लिया।

“अरे यार अजीब लौंडे हो, बात तो सुनो पूरी”, अन्नू ने शेरू को फिर से टोका। 

“हाँ बोलो, बताओ, क्या है?”, शेरू ने झल्लाते हुए कहा।

“अबे, तुम चलते फिरते किसी को अपनी बेगम बोल दोगे तो क्या वो तुम्हारी बेगम बन जायेगी? नहीं न? तो किसी को बहन बोलने से बहन कैसे बन जाएगी? वो भी जबरदस्ती। रिश्ता तो दिल से होता है, जुबान से नहीं”, अन्नू ने मानो शेरू के बुझे अरमानों के दिए में एक नयी लौ जला दी हो।

शेरू को जैसे आब-ए-हयात मिल गया। बेहद खुश मन से शेरू ने अन्नू की तरफ देखा और गले लग गया। अन्नू और शेरू के बीच की दोस्ती जो कुछ देर पहले अंकुरित हुयी, अब खिलने लगी थी।

“अच्छा सभी भाई अपनी-अपनी बहनो का ऐसे ही अभिवादन करेंगे, और याद रहे जैसे उदाहरण दिया गया था वैसे ही रहना चाहिए। थोड़ा भी ऊपर नीचे दिखाई दिया तो वहीं मुर्गा बना दिया जायेगा और राखी भी बंधवा दी जाएगी”, संदू ने एक बार फिर अपने खतरनाक इरादे ज़ाहिर कर दिए। संदु की हर बात मानो सबके दिल के आर पार जा रही थी, लेकिन ‘जिसकी कोई कहानी नहीं, उसकी कोई जवानी नहीं’ वाले मंतर का अनुसरण करते वहाँ का हर छात्र नियमों को तोड़ने के लिए आतुर था।

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संदु का प्रवचन ख़त्म हुआ और सभा भी भंग हो गयी।  सारे कैडेट्स को विश्राम स्थिति से मुक्ति मिली और एक दूसरे को जानने पहचानने का मौका दिया गया। लोग छोटे छोटे समूह में आपस में बात करने लगे। कुछ लोग नए मित्र बना रहे थे, तो कुछ पुराने मित्रों के साथ अटखेलियां कर रहे थे। कुछ लोग संदु की बातों का विश्लेषण कर रहे तो कुछ लड़कियों पर विशेष टिप्पणी। प्रायः सुनसान और वीरान पड़ा ये मैदान और वहाँ का माहौल, इन युवक और युवतियों के कारण जवाँ हो चुका था।

जिस तरह स्वयंवर के समय, अपने लक्ष्य को पाने के जुनून में अर्जुन की निगाह सिर्फ मंछली की आँख पर थी, ठीक उसी प्रकार शेरू भी काफ़ी हद तक अपने लक्ष्य पर डटा था। वो अन्नू, इक़बाल और कुछ नए मित्र मंडली में भले ही खड़ा था, पर उसकी निगाह दूर खड़ी अंजुम की आँखों से नहीं हट रही थी। कभी-कभी ध्यान भटकता भी था, तो उसकी निगाह से हट कर उसके होंठों तक ही जाता था, जो कभी मुस्कुरा रही होती तो कभी खुल कर हंस रही होती। अपने दोस्तों की बातों पर सिर्फ सिर हिला कर अपनी उपस्थिति का प्रमाण दे देता, मगर वो मानसिक रूप से वहाँ मौजूद नहीं था। फिर न जाने उसे क्या हुआ, वो सीधा अंजुम की तरफ बढ़ने लगा, मानो वो आज इज़हार-ए-मुहब्बत कर ही देगा। शेरू के इरादे को भांपते हुए, अन्नू भी उसके पीछे-पीछे गया ।

“Hello अंजुम”, शेरू बहुत ही संजीदगी के साथ बोला।  

“हाँ भाई शेरू”, जैसे ही अंजुम ने ये शब्द कहे, मानो डोसा वाले जलते तवे पर पानी छिड़क दिया हो और छन्न सा हुआ, बस यहाँ तवा नहीं शेरू की भावनाएं थी। उधर अन्नू ने अपने होंठों को दाँत से काटते हुए अपनी हंसी को रोकने की कोशिश की।

“अरे यार देखो भाई-वाई ना बोलो हमको, अगर तुमको शेरू नाम अच्छा न लगता हो तो हमको अशफ़ाक़ भी बोल सकती हो”, शेरू ने हल्की सी बेरुखी से कहा।

अंजुम शेरू के इशारे को भली भांति समझती थी, लेकिन फिर भी नादान बनते हुए कहा, “क्यों अभी सर ने तो ऐसा ही बोला है न?”

“अरे सर तो सुबह ये भी बोल रहे थे कि वो चाहते हैं हम सब चाँद तारों जैसे शिखर को छुएं जा के, तो क्या जाओगी ऊपर छूने?”, अंजुम की मासूमियत पर झल्लाते हुए शेरू ने कहा।

शेरू ने ज़ोरदार तर्क दिया, लेकिन इसके पहले शेरू बात आगे बढ़ाता कि, “अरे तुम मिश्रा सर के लड़के हो न?”, अंजुम ने अन्नू की तरफ हाथ बढ़ाते हुए तपाक से मेल जोल बढ़ाने का प्रयास किया।

“हाँ”, अन्नू ने अंजुम को ज्यादा तवज्जो न देते हुए हाथ मिला लिया। 

“अंजुम देखो तुमने गलती कर दी, अभी अभी सर ने कहा था न कि लड़कों को भाई बोलना है, लेकिन तुम भूल गई न पगली”, पगली शब्द जोड़ते हुए शेरू ने अथाह अपनापन जताने की कोशिश की।

“लेकिन तुम भी एकदम भुलक्कड़ हो शेरू, अभी-अभी तुमने ही बोला न कि सर की हर बात नहीं मानते, पागल”, अंजुम ने भी मुस्कुराते हुए नहले पे दहला मारा।

“अब इसको यहाँ पर आने की क्या ज़रूरत थी यार? फालतू का आमिर खान बन गया ये। हमने तो बुलाया नहीं था इसको। अगर सेटिंग करनी है तो अपनी जात बिरादरी में करे जा के”, ऐसे बहुत से सवालों के साथ शेरू ने अन्नू को मन ही मन कोसा। 

“अच्छा सुनो तुमसे काम है”, अंजुम ने बहुत ही मासूमियत भरी नज़रों से अन्नू की तरफ एक बार फिर देखा।

“क्या काम है?”, अन्नू अपनी बेरुखी को और स्पष्ट करते हुए बोला।

“मेरा भाई है फ़िरोज़, सुना है कि इस बार उसका सेण्टर तुम्हारे स्कूल में जा रहा है। अपने पापा से बोल कर उसकी हेल्प करवा दोगे क्या प्लीज़?  ज्यादा न हो पाए तो बहुविकल्पीय वाले सवालों में ही मदद करवा देना प्लीज”, अंजुम ने एक ज़िम्मेदार बहन का किरदार निभाते हुए अन्नू से गुजारिश की और साथ में दो बार ‘प्लीज’ बोल कर उसपर दवाव बनाने की भी कोशिश की।

“लेकिन तुम कैसे जानती हो हमको?”, अन्नू ने थोड़ा आश्चर्य में पूछा।

“मेरी सहेली है शिखा, उसने बताया। वो भी आयी है कैंप में”, अंजुम ने लड़कियों की भीड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा।

“देखो साला फिर अपने बाप के दम पर उछलेगा और हाँ बोलेगा, कमीना”, शेरू का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था कि अचानक अन्नू बोल पड़ा, “देखो बहन तुम्हारा नाम जो भी हो, काम तो सब हो जायेगा, लेकिन अगर शेरू कहेगा तो”, शेरू के कंधे पर हाथ रख कर अन्नू ने अपनी शर्त रख दी।

शेरू ने पलटी मारी और अन्नू की तरफ देखा, शेरू को ये समझ नहीं आ रहा था कि अन्नू ने ऐसा कैसे बोला? क्यों बोला? लेकिन बस उस समय शायद शेरू अन्नू के एहसान के नीचे ऐसा दबा कि बस दबा ही रह गया।

घर के बाहर शेरू को शायद ही इतना अपनापन किसी से मिला था। उस वक़्त शायद दो सेकंड के लिए अंजुम भी शेरू की प्राथमिकताओं की सूची में दूसरे नंबर पे आ गई थी। आप सारांश में ये मान सकते हैं कि जिस तरह दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा बना कर समाज में उसकी मान और मर्यादा को बचाया था ठीक उसी प्रकार, अन्नू ने भी शेरू को एक ख़ास स्थान दे दिया था। और जिस तरह लाख गलत होने पर भी कर्ण ने अपने प्राण देकर दुर्योधन का एहसान उतरा था, ठीक कुछ उसी तरह शेरू ने भी मन ही मन अन्नू को अपना दुर्योधन मान लिया था।

“हाँ तो शेरू क्या कहते हो, मैडम का काम किया जाये या नही?”, अन्नू ने शेरू से फिर पूछा।

“हाँ भाई, अंजुम बहुत ही ख़ास हैं हमारी, करवा देना काम अपने पापा जी से बोल कर”, शेरू ने अन्नू से आग्रह कर के थोड़ा एहसान का बोझ अंजुम कि तरफ धकेल दिया।

“You are so sweet”, अंजुम ने शेरू के गालों पर चिमटी क्या काटी मनो, आसमानी बिजली गिर गई हो, और शेरू के प्राण पखेरू उड़ते-उड़ते बचे। 

“तुम भी बहुत हो यही जो तुमने बोला”, चुम्मा के जगह चिमटी से ही संतुष्ट होने के विचार से शेरू ने भी मुस्कुराते हुए अपना जवाब दिया।

“Thanks अन्नू”, अंजुम ने अन्नू से हाथ मिलाते हुए अपना आभार प्रकट किया। “Thanks again शेरू!”

“अच्छा यहाँ Thanks-Thanks चल रहा है!  और तुमने इस लड़के से हाथ कैसे मिलाया?”, संदु ने ठीक उसी प्रकार छापा मारा, जैसे बोर्ड के इम्तेहान में उड़न दस्ता यानी ‘फ्लाइंग स्क्वॉड’आता है।

“ऐ मिश्रा जी के सुपुत्र, जयादा जवानी चढ़ी है तुमको? किस लिए हाथ मिलाया तुमने उस कन्या से?”, संदु ने आरोपों की झड़ी लगाते हुए अन्नू से चिल्ला कर पूछा।

“हाथ, नहीं तो, हमने कहाँ हाथ मिलाया”, अन्नू ने नकारने की कोशिश की।

“अच्छा, अच्छा, बड़े मासूम हो, चश्मा ज़रूर लगाते हैं लेकिन उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं बेटा, चलो मंच पर मुर्गा बनने”, संदु ने हिटलर की तरह फरमान सुनाते हुए अन्नू को इशारा किया।

“अरे नहीं सर, हमने कुछ नहीं किया”,  बरसों से मोहल्ले और पूरे क़स्बे में पहले ‘हीरो रेंजर’ उसके बाद ‘हीरो पुक’ से बनाई गई इज़्ज़त और स्टाइल की धज़्ज़ियाँ उड़ते हुए देख अन्नू ने इस बार गिड़गिड़ाते हुए मना किया। लेकिन संदु इस बार मिश्रा जी की हनक को ताक पर रख कर अन्नू को दण्डित करने का मन बना चुके थे।

“सर आपके चश्मे ने इस बार धोका दे दिया, हाथ अन्नू ने नहीं हमने मिलाया था”, शेरू ने अन्नू की तरफ देखते हुए कहा।

“ये क्या? शेरू ने हमारा आरोप अपने ऊपर ले लिया? वाह, ये हुआ न दोस्त”, अन्नू ने बिना कहे दिल से आभार जताया।

और उधर कर्ण, मतलब शेरू ने, दुर्योधन यानी अन्नू के किये हुए एहसान का बदला अपनी इज़्ज़त, जो शायद ज्यादा नहीं थी, गवांकर उतारा।

“अरे झूठ क्यों बोलते हो? मैंने देखा कि इस लड़के ने मिलाया है हाथ”, संदु ने फिर कहा।

“अरे नहीं सर, बोल रहे हैं न कि हमने मिलाया है हाथ। कहाँ बनना है मुर्गा बताइये”, शेरू ने कहा।

“अच्छा! अच्छा! जय और वीरू बन रहे हो दोनों, ठीक है! अभी तीन दिन बाक़ी है, हम दिखाएंगे तुम दोनों को असली गब्बर बन के”, संदु ने धमकाते हुए कहा।

“अरे सर बताओ न कहाँ बनना है मुर्गा”, शेरू ने धमकी को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करते हुए कहा।

“जाओ वहाँ मंच पर और पूरे एक घंटे के लिए मुर्गा बन जाओ, हम भी देखते हैं तुमको”, संदु ने बांह चढ़ाते हुए कहा।

“एक-दो घंटे का नहीं पता, जब तक बन पाएंगे, तब तक बने रहेंगे”, शेरू फिर से संदु को बिना भाव देते हुए मंच की तरफ बढ़ने लगा। 

“मान गए तुम दोनों की दोस्ती”, अंजुम ने शेरू और अन्नू की तरफ देखते हुए धीरे से कहा।

बचपन की दोस्ती शायद ऐसे ही होती है। ‘किसी से क्या काम निकलेगा?’, ‘किसी के पिता जी क्या करते हैं’, ‘कौन जाति है?’, ‘क्या धर्म है?’,  ये सब शायद मायने नहीं रखता। बस एक छोटा सा कारण चाहिए होता है दोस्ती के लिए। तभी तो जाति-धर्म  से अलग, 30 मिनट पहले हुई अन्नू और शेरू की दोस्ती के चर्चे पूरे कैंप में दिखने लगे थे।

25 मिनट मुर्गा बनने के बाद  शेरू ने पता नहीं क्या पट्टी पढ़ाई कि संदु ने सजा  माफ़ कर दी। थोड़ी देर बाद अचानक घोषणा हुई कि 2 घंटे का विश्राम होगा और उसके बाद शाम को 5 बजे लड़के ‘ग्राउंड नंबर 1’ में और लड़कियाँ ‘ग्राउंड नंबर 4’ में चाय के लिए मिलेंगी।

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Lafange

इत्तेफ़ाक़ से शेरू और अन्नू दोनों को एक ही टेंट मिला। साथ में चार लौंडे और भी थे। लेकिन, रौला सिर्फ अन्नू का ही था टेंट में। सबसे किनारे वाले गद्दे में अन्नू और उसके बगल वाले गद्दे में शेरू आकर धड़ाम से गिरे।

“भाई पानी पियोगे? धूप में थक गए होगे तुम”, अन्नू ने बहुत ही स्नेह से पूछा।

“हाँ भाई अगर पानी पिला दो तो मज़ा आ जाये”, शेरू ने गद्दे पर अपनी कमर सीधी करते हुए कहा।

“अबे गुप्ता, जाओ एक गिलास पानी लाओ, वहाँ कोने में घड़ा है”, अन्नू ने सनी गुप्ता, जो अन्य 4 लड़कों में ही एक था, से कहा।

सनी झट् से पानी ले आया और गिलास थमाते हुए बोला, “भाई ऊपर से पीना, मुँह मत लगाना एक ही गिलास है”

“अबे ज्यादा बकलोली न करो”, अन्नू ने सनी को डाँटते हुए कहा। “तुम मुँह लगा कर पियो भाई”, अन्नू ने शेरू की तरफ मुँह कर के बोला।

 “नहीं बाबा हम ऊपर से ही पी लेंगे, कोई दिक्कत नहीं है”, शेरू ने बिना मुँह लगाए एक बार में ही पूरा पानी पी लिया।

“हम हाई स्कूल में हैं और तुम?”, अन्नू ने अब औपचारिक तौर पर शेरू से जान पहचान बढ़ाई।

“अच्छा हम इंटर में हैं लेकिन तुम हमको भैया मत बोलना, हम तुम आज से best friend हैं”, शेरू ने अन्नू को जवाब देते हुए कहा।

“तुमने आज अंजुम के सामने हमारी इज़्ज़त बढ़ा कर बहुत बड़ा एहसान किया है, लेकिन तुमको कैसे पता कि हम उसको पसंद करते हैं?” शेरू ने कौतूहल से पूछा।

“हमने तुमको बहुत बार देखा है इस लड़की के पीछे बाइक से जाते हुए, और मंच पर उसके बगल में जब खड़े थे, तब तुम्हारे चेहरे की ख़ुशी को सारे कैडेट्स ने देखा था। जो थोड़ा भी समझदार होगा उसे ये बात समझने में ज्यादा देर नहीं लगी होगी। हमारे एक दोस्त ने फिनाइल पी लिया था एक लड़की के चक्कर में, तब से हमको लगता है कि भाई जो जिसको अच्छा लगे वो उसको मिल जाए”, अन्नू ने शेरू को समझाते हुए कहा।

“फिनाइल पीने के बाद मर गया क्या?”, सनी ने पीछे से पूछा ।

“बोलोगे तो मनहूस ही बोलोगे, मरा नहीं है बस बोल नहीं पाता है अच्छे से, फिनाइल पीने के चक्कर में जीभ गड़बड़ा गई होगी शायद, तुतला के बोलता है अब, ‘ओके’ को ‘ओते’ बोलता है”, अन्नू झल्लाते हुए बोला।

“और बताओ शेरू भैया, क्या प्लान है कैंप का?”, अन्नू ने दोनों हाथों की हथेलियों को कस के रगड़ते हुए और मुस्कुराते हुए पूछा।

“यार तुम शेरू बोलो, मेरी उम्र तो तुम्हारे आस पास की होगी। हम बोले न कि हम तुम best friend हैं, तो न भाई बोलो न भैया”, शेरू ने औपचारिकता ख़त्म करते हुए कहा।

“चलो तब तक ठीक है। तुमको गाने सुनाते हैं कुमार सानू के”, अन्नू ने अपने बस्ते में हाथ डालते हुए फिलिप्स का ‘वॉकमैन’ निकाला। किसी लौंडे के पास वॉकमेन का होना उसे दोस्तों के बीच अलग सम्मान दिलाता था और उसपर अगर बैग में एक्स्ट्रा बैटरी मिल जाये तो बस लड़का साक्षात देव पुत्र माना जाता था 

“अबे ‘वॉकमैन’, वाह अन्नू यार ये तुमने सही किया, साला कैंप में  मस्त टाइम पास हो जायेगा”,  वॉकमैन के हेड फ़ोन्स का एक सिरा अन्नू और दूसरा शेरू के कान में जैसे ही गया, कुमार शानू ने भी अपना जलवा दिखाना चालू कर दिया। सनी और अनूप बिना किसी प्रतिस्पर्धा के वेटिंग लिस्ट में आ गए थे।

गाना सुनते सुनते, कब झपकी लगी किसी को पता नहीं चला।

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“अबे चलो संदु माइक पर चिल्ला चिल्ला कर सब को आवाज़ दे रहा है”, अनूप ने सनी, राहुल, सतीश, अन्नू और शेरू को जगाते हुए कहा। राहुल और सतीश टेंट के बचे हुए अन्य दो लड़के थे।

“चलो यार चला जाये”, मुँह धोने के बाद शेरू ने अन्नू को अपना कंघा थमाते हुए कहा।

“अबे यार हमारा एक बाल सफ़ेद है देख लो कहीं तुम्हारे भी न हो जाये”, अन्नू ने शेरू के कंघे से बाल बनाते हुए मज़ाक किया।

“हो जाने दो यार, दोनों भाई सफ़ेद बालों के साथ तफरी काटेंगे और क्या”, दोनों ठहाके लगते हुए ‘ग्राउंड – 1’ की तरफ चल दिए।

यूँ तो ‘ग्राउंड -1’ और 4 जाने का रास्ता बिलकुल अलग था, लेकिन ‘जवानी में अगर कहानी न हो तो क्या ख़ाक जवानी’ ये वाला नारा दोनों तरफ के घुसपैठियों ने एक बार फिर पालन करते हुए वो रास्ता चुना जहाँ दोनों पलटनों का आमना सामना हो।  अपनी आदत से मज़बूर लगभग 85% लौंडों ने अपनी-अपनी वाली चुन ली थी और अपनी अपनी वाली का पुनः दर्शन करने के लिए हर लौंडा एक दम तैयार हो कर आया था। 

शेरू और अन्नू ने अपनी पैंट की क्रीस एक बार फिर ठीक करते हुए अपने-अपने रडार चालू कर लिए। शेरू का राडार अमूमन अंजुम को ढूंढ रहा था और अन्नू का राडार ‘कोई भी अच्छी वाली’  के सिग्नल का इंतज़ार कर रहा था। अचानक शेरू के राडार में आवाज़ आते ही अंजुम का आगमन हुआ। अंजुम ने शायद ड्र्रेस बदल ली थी और नयी ड्रेस पहले से कही ज्यादा फिट आ रही थी, और NCC वाली टोपी पर लाल रंग वाली कलगी सर पर कोहिनूर वाला  हीरा लग रही थी । 

“अबे यार शेरू हमको यही वाली भाभी चाहिए”, अन्नू ने चमकती हुई आँखों से कहा और इधर  टेंट के बाक़ी लौंडों  ने अपनी आदत से मज़बूर हो कर एक स्वर में ‘भाभी, भाभी, भाभी’ का सम्बोधन कर के अंजुम को शेरू की औपचारिक तौर पर  दावेदारी का एहसास करवा दिया।

“यार ये लौंडे एकदम दिमाग से पैदल हैं क्या?”, शेरू ने अन्नू को उन सभी लौंडो को चुप रखने को कहा। अन्नू कुछ बोलता उससे पहले ही चारो लौंडे वहाँ से कट लिए।

“भाई ये भौजाई के बगल वाली लड़की कौन है?” अन्नू ने शेरू के कन्धों पर अपना कन्धा मारते हुए कहा।

“अबे यही शिखा है शायद, DSP शुक्ला की लड़की। इसका बाप आये दिन लौंडों को इसके चक्कर में कूटता रहता है”, शेरू ने वैधानिक चेतावनी देते हुए शिखा का परिचय दिया।

एकदम ‘स्लिम ट्रिम’, कमर तक लम्बे बाल, बड़ी बड़ी आँखें , दाहिनी भौं के ऊपर गहरा तिल और मॉडर्न कपड़े शिखा शुक्ला की पहचान थे और कोयल सी ऐसी मीठी आवाज़ कि किसी का भी दिल जीत ले। चूँकि पिता जी पुलिस के अधिकारी थे तो मज़ाल किसी की कि कोई अंट शंट बोल पाए।  यहाँ ये भी जानना ज़रूरी है कि  कुछ सहेलियों के द्वारा उसकी तुलना राजा हिन्दुस्तानी वाली करिश्मा कपूर से भी की जाने लगी थी। 

“अबे देखा जायेगा, हमारे भैया भी IPS हैं, चलो मिल कर आते हैं”, अन्नू ने शेरू का हाथ पकड़ कर खींचा।

“क्या नाम है आपके भाई का?”, शेरू ने अंजुम से बात शुरू करने के बहाने से सवाल पूछा

“बताया तो था”, अंजुम ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अरे सुबह से याद कहाँ हैं कुछ इनको”, अन्नू ने शेरू की खिंचाई करते हुए कहा।

शेरू ने शरमाते हुए अंजुम की तरफ झटके से देख के इधर उधर नज़र करने की कोशिश की। अंजुम भी लगभग लगभग सब बातें समझ रही थी कि तभी अन्नू ने बगल वाली लड़की से पूछा, “आपका नाम क्या है?”

“शिखा, और तुम अन्नू हो ना?”

“हाँ तुमको कैसे पता?”, अन्नू ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा

“अरे तुम्हारी मामा की लड़की है ना ऋतु, वो हमारे साथ ही पढ़ती है और एक बार तुम उसको कुमार कोचिंग में छोड़ने आये थे, तभी उसने बताया था”, शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अच्छा तब से याद है तुमको?”, अन्नू ने थोड़ा ‘फ़्लर्ट’ करते हुए कहा

“हाँ तुम काफी स्वीट हो तो याद है हमको “, शिखा ने शरमाते हुए कहा। 

“और हम बहुत खट्टे हैं”, अचानक संदु की कर्कश आवाज़ ने पूरी प्रेम-लीला अंकुरित होने से पहले ही कुचल दी । 

“कभी अपनी अम्मा को भी बोल दो कि बहुत स्वीट हो, क्या ज़माना आ गया है”, संदु ने ताना कसते हुए बोला।

“तुम तीनो पर मेरी नज़र है सुबह से है, जवानी उबल रही है तुम सब की, और अब ये मोरनी भी शामिल हो गयी। किया है इसका भी इंतज़ाम। भाग जाओ यहाँ से अपनी अपनी पंक्ति में खड़े हो जाओ”, संदु ने चारों की बेज़्ज़ती करते हुए वहाँ से भगाया।

लेकिन वहाँ कहाँ किसी को इज़्ज़त की परवाह थी, अंजुम और शेरू एक दूसरे को और अन्नू ने शिखा को ताड़ना शुरू कर दिया था। और एक झटके में तीन घंटे पहले बने दोस्त अब साढ़ू बन गए थे।

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“मैं आशा करता हूँ, आप सब इस अप्रतिम आनंद का अनुभव कर रहे होंगे, एक दो को छोड़कर आप सब ने अनुशासन का पालन किया है।  बाक़ी उन एक दो लोगों को भी अगले दो दिन में अनुशासन घोल कर पिला दिया जायेगा”, ऐसा बोलते हुए संदु ने शेरू और अन्नू को खुलेआम धमकी दे डाली।

“अब एक खास चाय आप सबका इंतज़ार कर रही है, और हाँ आप सब के अनुशासन को देखते हुए मुझे ये कहते हुए हर्ष हो रहा है कि जो भी छात्र चाहे कितनी भी बार चाय पी सकता है, लेकिन Parle-G का पैकेट एक ही लेना ईमानदारी से”, संदु ने ये बोलते हुए अपना बड़ा दिल और कंजूस सोच दोनों का एक साथ प्रदर्शन कर दिया।

संदु के भाषण के बाद लौंडे चाय की स्टाल पर टूट पड़े, सबने कम से कम 3-4 कप चाय तो पी ही ली थी, Parle-G  के खाली पैकेट भी पूरे मैदान में गुलाटी मार रहे थे, शायद सबको ये नहीं पता था कि बाद में पूरे मैदान की सफाई भी लौंडों को ही करनी है। 

“अबे कुछ भी कहो, चाय मस्त थी”, सनी ने अनूप से कहा।

“हाँ बे हमने साला 5 कप पेल दिया, और Parle-G भी दो पैकेट उड़ा दिए”, अनूप ने अपनी बहादुरी बताते हुए पेट पर हाथ फेरा।  

“साले तुम सब अघोरी हो, हमने और शेरू ने 2-2 कप ही पी”, अन्नू ने ऐसे कहा मानो समाज की मर्यादा का पालन किया हो। 

“चलो सब लोग लाइन में लग जाओ बहुत महत्वपूर्ण बात करनी है तुम लोगों से”, संदु की आकाशवाणी फिर गूंजी। मन भर चाय पीने की ख़ुशी में अगले 5 मिनट में ही सभी कतार में खड़े हो गए।

डूबते सूरज की रोशनी में संदु का चेहरा खिल रहा था और इसी चमकते चेहरे के साथ संदु ने भाषण शुरू किया, “बच्चों, आप सब के अनुशासन को पुनः साधुवाद देने के साथ-साथ मैं एक बार फिर इंदिरा गांन्धी जी को स्मरण करना चाहता हूँ।  जितनी गतिमान इंदिरा जी थी उतने ही ज्यादा प्रभावषाली व्यक्ति थे उनके सुपुत्र संजय गाँधी।  और क्या कोई बता सकता है कि संजय गाँधी ने जनसँख्या नियंत्रण के लिए किस योजना को बेहद प्रभावशाली रूप से लागू किया था?”,

“चकबंदी!”, बीच से बबलू कटियार नामक मेधावी छात्र ने बेहद तेज़ आवाज़ में जवाब दिया।

“तुम्हरे पिता जी ने समय पर ‘चकबंदी’ कराई होती तो तुम जैसा नामाकूल पैदा न होता”, संदु ने बबलू की सरेआम बेजत्ती कर दी। इंदिरा जी से जुड़ी कोई भी गलती संदु को कतई बर्दाश्त नहीं थी।

“नसबंदी, नसबंदी”, संदु ने बबलू के शब्द का संशोधन करते हुए कहा। 

“अरे हाँ वही”, बबलू ने झेपते हुए धीरे से कहा और आस-पास के कैडेट्स को सहानुभूति की अपेक्षा से देखा।

“ये नसबंदी क्या होती है बे?”, अन्नू ने शेरू से पूछा। 

“अरे यार पढ़े थे मगर याद नहीं आ रहा, लेकिन इसको करवाने के बाद बच्चे नहीं होते कभी भी”

“अच्छा, हाँ याद आया, अन्नू ने झूठ ही हाँ बोलकर माहौल बनाते हुए एक और सवाल दागा, “ये आदमी की होती है कि औरत की”

“आदमी लोगों की नसबंदी होती है, हमारे पापा नसबंदी कराये थे लेकिन वो सही नसबंदी नहीं थी काहे कि हम नसबंदी के बाद पैदा हुए थे। उसके बाद पापा ने अस्पताल के डॉक्टर पर मुकदमा भी किया था,  दादी ने हमको बताया था। वैसे वो बड़ी खुश थीं, गलती से ही सही, 4 बेटियों के बाद मेरा जनम हुआ था”,  सनी ने अपनी आपबीती बता दी।

“अच्छा, बताओ यहाँ भी घोटाला किया सरकार ने”, अन्नू ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा। 

“नहीं ऐसा नहीं है, असफल नसबंदी के मुक़दमे को जीतने के बाद हम लोगों को दो बीघा ज़मीन भी मिली थी”, सनी ने सरकारी सांत्वना का बखान भी किया।

इधर ये विश्लेषण चल ही रहा था कि अचानक संदु ने अपने भाषण में गंभीरता का तड़का लगाया, “आप सब बच्चे अपने-अपने यौवन की पराकष्ठा की ओर अग्रसर हैं, और उसी पराकष्ठा के कारण आपका विपरीत लिंग की तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक है। लेकिन कभी-कभी इसी आकर्षण के चक्कर में आप जैसे होनहार छात्र बहुत बड़ी और न सुधार करने वाली गलतियाँ कर देते हैं”।

“अबे ये संदु हिंदी वाले मास्टर जी की तरह क्या कठिन-कठिन हिंदी क्यों बोल रहा है?”, सतीश ने अन्नू से पूछा।

“अबे हमको भी समझ नहीं आया, बस ‘यौन सम्बन्ध’ टाइप कुछ सुनाई दिया है”, अन्नू संदु की तरफ ही ध्यान केंद्रित करते हुए बोला।

“अबे यौन सम्बन्ध नहीं, यौवन बोला है, और उसके कहने का मतलब है कि जवानी में लौंडे कोई गलती न कर दे”, सनी ने भावार्थ एकदम देशी भाषा में समझाया।

“अबे लौंडे गलतियां करने ही तो आये हैं यहाँ पर”, शेरू ने एकदम गुलशन ग्रोवर की स्टाइल में कहा, स्टाइल में थोड़ी वासना, नहीं शायद पूरी वासना भरी हुई थी।

“और जब हम सभी शिक्षकों ने ये कैंप आयोजित करने का संकल्प लिया तो उस संकल्प में एक और संकल्प किया कि इस कैंप में कोई भी उंच नीच नहीं होने देंगे। क्योंकि, अगर कोई उंच-नीच हुयी तो मैं अपनी आदर्श इंदिरा जी को ऊपर जा कर मुँह कैसे दिखा पाउँगा?”, संदु ने फिर आसमान की तरफ देख कर पूजनीय इंदिरा जी को याद किया।

वो आगे बोलते हैं, “बस इसी वजह से न चाहते हुए मैंने कैंप के इतिहास में ये अनूठा प्रयोग करने का संकल्प लिया है। और ये संकल्प मेरी आदर्श इंदिरा गाँधी जी के सुपुत्र संजय गाँधी जी के नेक कार्य से प्रेरित है”

“अबे ये साला कहीं हम लोगों की नसबंदी की बात तो नहीं कर रहा?”, शेरू ने आशंका जताई ।

“नहीं बे, वो शादीशुदा लौंडों का किया जाता है”, सनी ने शेरू को क्षणिक ढांढस बंधाया।

“अच्छा बच्चों एक बात बताओ, अगर किसी समस्या का खत्म करना हो तो सबसे कारगरी उपाय क्या है?”, संदु ने सवाल पूछा।

“उस समस्या की जड़ को ही ख़तम कर दो, न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी”, बबलू कटियार ने एक बार फिर अपनी बुद्धिमता का प्रदर्शन किया।

“बिलकुल सही जवाब बेटे इसीलिए आप सब लोगों ने जिस चाय का आनंद लिया है उसमे आपके यौन क्षमता को कम करने की एक औषधि का मिश्रण किया गया है। उस औषधि के कारण आपका पौरुष 3-4 दिन तक किसी काम का नहीं रहेगा”, संदु ने बड़ी गंभीरता के साथ कहा।

यूँ तो संदु ने परमाणु बम छोड़ा था, मगर शुद्ध हिंदी भाषा से गरीब 99.9% लौंडों को ये बात समझ में नहीं आयी थी कि उनकी मरदाना ताकत के साथ संदु ने खिलवाड़ कर दिया था और अभी भी सब संदु को ध्यान से सुन रहे थे। और बाक़ी 0.01% लौंडे, जिनको बात समझ में आयी भी,  वो भी आगे ध्यान से सुन रहे थे कि कहीं उन्हने गलत तो नहीं सुना।

“अबे यार ये क्या बोले पड़ा है कठिन-कठिन, साला समझ नहीं आ रहा, अबे सनी तुम तो हिंदी के मास्टर के बेटे हो तो बताओ कुछ”, अन्नू ने पीछे मुँह करते हुए पूछा। लेकिन ये क्या सनी पसीने से लथपथ और दोनों हाथ पेंट में डाल कर बहुत तेजी से कुछ खोजने की कोशिश कर रहा था।

“अबे क्या हुआ क्या ढूंढ रहे हो?”, अन्नू ने सनी से कहा।

“अबे ढूंढ नहीं रहे हैं, साला ये कमीना संदु खेल गया है हम लोगों के साथ”, सनी ने बेहद तनाव भरी आवाज़ में कहा।

“मतलब?”, शेरू के भी चेहरे पर तनाव साफ़ झलकने लगा ।

“अबे चाय में दवा मिली थी यार, जिससे हम सारे लौंडे अगले 3 – 4 दिन तक नामर्द हो जायेंगे”

ये हिंदी अनुवाद 20 सेकंड में पूरे मैदान में आग की तरह फ़ैल गया, और पूरे मैदान में दहशत और ठिठकारियाँ एक साथ देखने को मिली। जहाँ हर लौंडा दहशत में था वहाँ ये बात सुन कर लड़कियों की टोली दबी जुबान में हंसने लगी।

“अरे सर ये क्या किया आपने?”, एक स्वर में लगभग सभी लौंडे चिल्लाये।

“ज्यादा उछलो मत नहीं तो कैंप से भगा दूंगा अभी”, संदु ने फिर धमकाने वाले अंदाज़ में कहा।

“सर अच्छा जिसने 8 कप चाय पी होगी उसका क्या?”, एक लौंडे ने अवसाद में आते हुए पूछा।

“अरे भुक्खड़ नालायक, 8 कप बहुत ज्यादा हो गयी, अब महीना – डेढ़ महीना सिर्फ पढाई पर ध्यान रहेगा तुम्हारा”, संदु ने एक यौन शक्ति क्षीण औषधि विशेषज्ञ की तरह जवाब दिया।

“सर ये रोशन ने चाय नहीं पी थी”, तीन लौंडे एक साथ चिल्ला कर बोले, “सर इसको भी पिलवाइये अभी”

“अच्छा और कितने लोग है जिन्होंने चाय नहीं पी थी”, संदु ने पूछा।

उसके बाद कुछ 9 लौंडे मुखबिरी का शिकार होते हुए न चाहते हुए भी चाय का सेवन कर रहे थे। सभा बर्खास्त हो चुकी थी और सब फिर से अपनी-अपनी टोली बना कर ये हिसाब कर रहे थे कि किसने कितनी चाय पी थी।

“अरे यार और करो जबरदस्ती, साला हम बस 2 कप पी रहे थे, साला ये अनूपवा हमको 5 कप चाय पिलवा दिया”, सनी ने अनूप को कोसते हुए कहा।

इधर शेरू और अन्नू की वो हालत थी कि जैसे काटो तो खून नहीं, वैसे दोनों के इरादे जनसँख्या वृद्धि के बिलकुल नहीं थे, फिर भी ये बहुत बड़ा झटका था। 

“साला ये बहुत ही ज्यादा बड़ा वाला काट गया हमारा। हम भी दो ही पिए होंगे। आखिरी में तो अन्नू का ही छीन कर पिए थे”, शेरू खुद पर गुस्साते हुए कहा।

“हम भी दो ही कप पिए थे, और आखिरी कप तुमने छीन कर हमको चार दिन कि जवानी वापस कर दी”, अन्नू माहौल को शांत करने की कोशिश में कहा।

“इसकी माँ, बहिन और बुआ सबको गरियाने का मन कर रहा है और ये अन्नू को मज़ाक सूझ रहा है”, शेरू ने हद से ज़्यादा गुस्से में कहा।

“यार बुआ को न गरियाओ”, सनी ने बीच में ही टोकते हुए कहा।

“अच्छा बुआ तुम्हरी अम्मा लगती है क्या?”, शेरू का पारा एक दम चरम पे था।

“अम्मा नहीं, मेरी चचेरी दादी संदु की बुआ लगती हैं”

“एक मिनट, एक मिनट, साले तुम बनिया और संदु पंडित, तो रिश्तेदार कैसे बे?”, शेरू को घोर आश्चर्य हुआ।

“अरे लव मैरिज हुई थी, भगा के शादी किये थे”

“अरे साला, इसके पूर्वज प्रेम विवाह करें और यहाँ हम लोगों का हाथ पकड़ना भी बर्दाश्त नहीं साले इस कोढ़ी को”, इस बार अन्नू का गुस्सा थोड़ा उबाल लेने लगा।

“साला इसका बाप अगर नसबंदी करवा लेता तो ये पैदा ही नहीं होता, कसम से कमीना है भाई”, सतीश ने भी स्वादिष्ट चाय के चार कप के जायके को याद करते हुए बोला।

तभी पीछे से रोने की आवाज़ आई, सबने पलट के देखा तो बबलू कटियार भें भें कर के रो रहा था।

“अच्छा भाई तुम्हारी बांसुरी बज रही है की नहीं? तुमने ही उदाहरण दिया था न संदु को”, अन्नू ने तंज कसते हुए कहा।

“कहाँ भाई नहीं बज रही, कीड़े पड़ेंगे साले को”, बबलू ने भी संदु को कोसते हुए कहा ।

‘वफ़ा ना रास आई…….तुझे ओ हरजाई’, इसी भावना के साथ सारे लौंडे अपने अपने कैंप की तरफ गए।

संदु को गरियाते-गरियाते लौंडों की वो शाम कब बीती पूरे कैम्प को हवा नहीं लगी। क्यों कि ये खबर दूसरी पार्टी को भी लग गई थी, फिर क्या था, लौंडे लड़कियों से कटे-कटे घूम रहे थे। संदु की ये सर्जिकल स्ट्राइक गजब काम कर कर गई थी। इसकी वजह से बॉर्डर सिक्योरिटी फार्स और पकिस्तान रेंजर्स के ऊपर दबाव बहुत कम  हो गया था।

अगले दिन से NCC कैंप की नियमित पिलाई शुरू हुयी मगर शेरू और अन्नू की ज्यादा पिलाई हुई। पूरे मैदान की घास, पार्ले जी वाले खाली पैकेट और पता नहीं क्या क्या बटुरवाया उनसे।

“अबे शेरू उठो यार, साला ये संदु जान ले के मानेगा भाई। बोल रहा है कि 1000 आम के पौधे लगाने हैं मैदान के किनारे किनारे”, मैदान में थोड़ी देर सुस्ताने के लिए बैठे शेरू को अन्नू ने कहा।

“साला ये प्रकृति का बाप बन गया है, देखो पौधों की भी नसबंदी ना करवा दी हो इसने”, अनूप ने अन्नू और शेरू से कहा।

“ए तुम दोनों, इधर आओ”, संदु ने शेरू और अन्नू को बुलाया।

“तुम दोनों अकेले 50 पेड़ लगाओगे समझे?”, संदु की खुन्नस ख़तम होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

“लगा लेंगे, कहो तो सौ लगा दें?”, शेरू की भी खुन्नस बढ़ती जा रही थी। वो सोच रहा था, आखिर क्यों आया इस कैंप में। अंजुम से बाहर दोस्ती कर लेता।

“हाँ हाँ, पहले 50 तो लगाओ उसके बाद देखेंगे”, संदु ने भी टप्प से जवाब दिया।

“अगर इसको सरकारी दुकान से एक किलो भी सामान मिल गया तो हम क़स्बा छोड़ देंगे अन्नू। देख लेना तुम साले इसका राशन कार्ड न अवैध करवाया तो मेरे नाम से कुछ भी पाल लेना”, शेरू ने वहीं मुट्ठी में मिट्टी उठा कर अन्नू के सामने संकल्प किया।

“चलो शेरू फावड़ा उठाओ, तुम दस गड्ढा खोदो हम पेड़ रोपते जाते हैं, फिर दोनों काम की अदला बदली कर देंगे”, अन्नू ने काम का बंटवारा किया।

शेरू ने भी अपना जूता खोल कर किनारे रखा, पतलून घुटने के ऊपर तक चढ़ाई और गड्ढा खोदना शुरू किया। इधर अन्नू पौधे लाने चला गया।

अचानक तेज़ आवाज़ के साथ शेरू वहीँ पर पैर पकड़ कर ‘अन्नू, अन्नू’ चिल्लाते हुए गिर पड़ा।

“क्या हुआ शेरू?”, अन्नू तेजी से दौड़ता हुआ शेरू के पास पहुँचा और उसके पैर को देख कर चिल्लाया, “अबे यार, ये क्या कर दिए तुम यार?”

शेरू ने फावड़ा अपने पैर में मार लिया था।

“सर, सर, सर, शेरू, के पैर की दो ऊँगली कट गई सर”, अन्नू वहीँ  से चिल्लाते हुए संदु को बुलाये जा रहा था। जब उसने अनसुनी की तो अन्नू ने सनी और अनूप को शेरू के पास छोड़ कर तेजी से संदु की तरफ दौड़ लगाई।

“सर, सर, जल्दी चलो, शेरू का पैर कट गया है, दो उँगलियाँ जड़ से एकदम अलग हो कर लटक रही है। सर जल्दी चलिए शेरू को डॉक्टर के पास ले चलते हैं, अन्नू ने संदु का हाथ पकड़ के अपनी तरफ खींचना चाहा।

आवेश में आकर संदु ने अन्नू को एक तमाचा जड़ दिया और कहा, “अरे पगला गए हो क्या? मरा तो नहीं है न, जो इतना हल्ला काट रहे हो, फालतू का माहौल न बनाओ, जाओ और बेटाडीन लगा दो”

“अरे आपका दिमाग ख़राब हो गया है क्या? कैसे इंसान हैं आप? कल से आप एक से एक ऊल जलूल काम कर रहे हैं , लेकिन हम लोगों ने कुछ नहीं कहा, लेकिन अभी वहाँ धार बाँध कर खून बह रहा हमारे दोस्त का और आप सुन नहीं रहे हैं और ऊपर से हमको ही मार दिए”, अन्नू ने आपा  खोते हुए कहा। आमतौर पर शाँत सवभाव वाले अन्नू का ये रूप देख कर वहाँ खड़े उसके स्कूल के कैडेट्स अचंभित रह गए।

“अरे बद्तमीज़ लड़के कैसे बात कर रहे हो? जानते हो न कि तुम्हारा सर्टिफिकेट खारिज हो सकता है इसकी वजह से?” संदु ने धमकी देते हुए कहा।

“अरे नहीं चाहिए ऐसा सर्टिफिकेट, उसको फ्रेम करा के आप लगा लेना अपने घर में, जल्दी बताओ चलना है कि नहीं?”, अन्नू ने आखिरी बार पूछा

“नहीं तुम सब साले झूठे और मक्कार हो, नहीं जाता मैं, तुम्हारा दोस्त मरता है तो मरे मेरी बाला से”, संदु अन्नू से मुँह फेर कर दूसरी दिशा में चला गया।

“भाड़ में जाओ तुम और ये जो थप्पड़ मारा है ना, याद रखना आप इसको”, ये कह कर अन्नू दौड़ते हुए शेरू के पास पहुंचा।       

उसके पीछे कुछ और दिलेर कैडेट्स आये और कुछ ने संदु के डर से दूर से स्थिति का आंकलन और विश्लेषण करना उचित समझा।

“सन्नी, अनूप, राहुल, सतीश जल्दी शेरू को पकड़ कर उठाओ, यहीं  कैंप के बाहर प्रीती हॉस्पिटल है, वहीँ ले चलते हैं”, अन्नू ने हाँफते हुए कहा। “बस ध्यान रहे शेरू का पैर थोड़ा ऊपर की दिशा में रहे ताकि खून ज्यादा न बहे”, अन्नू ने थोड़ा सामान्य ज्ञान लगाते हुए कहा ।

पाँचों ने जैसे तैसे 400 मीटर की दूरी तय करते हुए शेरू को अस्पताल तक पहुँचाया।

“डॉक्टर मैडम, डॉक्टर मैडम, हमारे दोस्त को चोट लग गई है, ऊँगली कट गई है, इसको दवा दे दो, पट्टी बांध दो, हमारा अच्छा दोस्त है ये”, अन्नू ने थोड़ा रुवासे होते हुए कहा।

“हाँ हाँ लेकिन ये हुआ कैसे?”, डॉक्टर ने पूछा

“पेड़ लगा रहे थे हम लोग NCC कैंप में, तभी लग गई”, अनूप ने झट से बोला। अनूप ने शेरू का चोटिल हुआ पैर संभाला था इसी लिए उसके NCC के वर्दी में खून के दाग लग गए थे। 

“अच्छा ठीक है, तुम वहाँ जाओ काउंटर में पर्ची बनवाओ, मैं भेजती हूँ किसी को, डॉक्टर ने सीढ़ियों पे चढ़ते हुए कहा।

“सन्नी जाओ जल्दी से पर्ची बनवाओ, हम हैं शेरू के पास”, अन्नू ने कहा।

“अन्नू हमको कुछ होगा तो नहीं न यार, हमारा बहुत खून बह चुका है यार, शेरू ने रोते हुए कहा।

“नहीं भाई कुछ नहीं होगा तुमको, हम हैं न”, अन्नू ने ढाढस बंधाया।

“यार वो पैसा मांग रहा है”, सनी ने वापस आते हुए कहा।

“चलो देखते हैं”, अन्नू और सनी रजिस्ट्रेशन काउंटर की तरफ भागे।

“भैया हम लोग यहाँ कैंप में आये हैं, इनके अब्बू आ कर पूरे पैसे दे देंगे, आप भर्ती तो करो, बहुत खून बह रहा है”, अन्नू ने वहाँ काउंटर पर बैठे एक कर्मचारी को समझाने की कोशिश की।

“नहीं, 200 रुपया देना ही पड़ेगा भाई, ये नियम है यहाँ का, नहीं तो मेरे तनख्वाह से काट लेंगे”, कर्मचारी ने उसकी मज़बूरी का हवाला दिया

“अच्छा, तो ये लो मेरी दो अंगूठियाँ, शुद्ध सोने की है, चाहे सुनार के यहाँ जाँच करवा लो, और 50 रूपया ऊपर से लो। भैया जो था सब दे दिए, अब तो भर्ती करो, बहुत खून बह चुका है”, अन्नू ने हाथ जोड़ते हुए कर्मचारी से कहा और इस बार एक आंसू भी टपक गया था।

“अरे नहीं भाई, ये सब नहीं, पैसा चाहिए”, कर्मचारी ने वापस अपने काम पर ध्यान देते हुए कहा।

“माँ कसम, हमारे दोस्त को कुछ हुआ ना, तो इस अस्पताल का वो हाल करेंगे कि किसी को कभी तनख्वाह देने लायक नहीं बचेगा”, इस बार अन्नू ने अपना फिर से रौद्र रूप दिखाते हुए बोला।

कर्मचारी कुछ पल के लिए ये दोस्ती देख कर भावुक हो गया था, और फिर क्षण भर में भयभीत भी हो गया। उसने तुरंत पर्ची बनाई और कहा, “भाई तुम्हारे जैसे दोस्त का अंगूठी ले कर पाप नहीं लेना मुझे, लेकिन हाँ बिना पैसा का उसे अस्पताल से छोड़ा नहीं जायेगा। तब तक पैसे का इंतज़ाम कर लो। ये लो पर्ची और जल्दी से जाकर इलाज़ करवाओ दोस्त का”।

अन्नु भागा-भागा शेरू के पास पंहुचा और सच्ची दोस्ती और हमदर्दी से अन्नू ने शेरू की तरफ मुस्कुरा कर देखा और कहा, “बस भाई अब नहीं होगा कुछ”।

सनी ने भी शेरू के हाथ को हलके से दबाते हुए कहा, “सच में जब अन्नू जैसा दोस्त साथ हो, तो किसी को कुछ नहीं हो सकता”।

इस बात पर शेरू ने सिर्फ हल्के से मुस्कुरा कर अपना दर्द छुपाना चाहा।

शेरू को भर्ती करने के बाद, डॉक्टर ने कहा, “शेरू को 8 टाँके लगेंगे, और खून भी बहुत बह गया है, शायद खून भी देना पड़ सकता है”

“अरे मैडम हमारा ले लो खून, हम दे देंगे”, अन्नू ने बिना किसी देरी के डॉक्टर को पेशकश दी।

“अरे नहीं बेटे अभी नहीं, कल तक चाहिए और वो भी अगर ज़रूरी पड़ा तो”, डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।

अब तक शेरू के घर पर खबर पहुंच चुकी थी और उसके घर से 3-4 लोग उसको लेने भी आ गए थे, किसी बड़े अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए।

NCC कैंप बाकि दो दिन चला मगर शेरू अपने जख्म के कारण आगे हिस्सा नहीं ले पाया। अन्नू को भी उसके दुर्व्यवहार के लिए कैंप से निकालने की तैयारी हो रही थी मगर अन्नू ने खुद वहाँ से अपना नाम हटवा लिया और शेरू के इर्द-गिर्द अस्पताल में रहना उचित समझा। सनी, अनूप और बाकि कुछ दिलेर कैडेट्स जो शेरू को अस्पताल लाये थे, उनपर अनुशाशनहीनता का आरोप लगा और कैंप के दौरान सजा मिली। उनको बाकी के पेड़ को लगाने का काम मिला। NCC का ये ऐतिहासिक कैंप बिना किसी ऊंच-नीच के संपन्न हुआ।

                     …….to be continued

5 thoughts on “लफंगे

  1. वाकई बहुत उम्दा लिखा है। पढ़ते समय शब्द कानों से जैसे सुनाई दे रहे हों और आंखों से मंज़र दिखाई पड़ रहा हो, ऐसा महसूस होने लगे तो मानो इससे ज्यादा और कुछ नहीं हो सकता।। यही अनुभव कुछ इस उपन्यास के साथ रहा।
    अनुराग जी व संजीव जी को बहुत बधाई ।

  2. Lafange shaii bahut hi badhiya hai. Aisa laga jaise hum khud bhi us camp ka Hissa hoon.

  3. सर कॉलेज के दिन याद आ गए । मुझे कहानी पढ़ने के दौरान ऐसा प्रतीत हुआ जैसे लेखक ने खुद की कहानी लिखी है। एक एक शब्द जीवित जैसा लगा।

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